बुधवार, 27 अक्टूबर 2010
कब बहुरेंगे दिन
बिरसा मुंडा झारखण्ड में भगवन माने जाते हैं .वहां की जमीन आज भी पाक मानी जाती है .वह बस इसलिए की उन्होंने जनहित और राजहित के लिए लड़ते हुए अपनी जन दी .उन्होंने वहां की सरजमी को खून से शिचा आज भी वहां की भूमि पाक है । बिरसा ने लोगों का नेतृत्व करते हुए नेता के रूप में नई इबारत लिखी .मरणोपरांत उनकी क़ुरबानी और उनके त्याग ने उन्हें भगवन के समानांतर बैठा दिया .लेकेन एक सवाल जो वो छोड़ गये की क्या उनके सपने में रचा बसा राज्य ऐसा होगा ? झारखण्ड का गठन इस विस्वास के साथ हुआ था कि वहां कि सरकार इसकी सांस्कृतिक पहचान और जनजातिय हितों कि रक्षा करेगी .परन्तु ऐसा कुछ नई हुआ मसलन आज झारखण्ड कि राजनीति अस्थिरता को देख कर राज्य के गठन पर सवालिया निसान लगने लगे हैं .लगभग दस वर्सो में बतौर आठवे मुख्यमंत्री कि सपथ लेने वाले मुंडा तीसरी बार सत्ता पर काबिज हैं .यहाँ मुंडा, कोड़ा सरीखे सरे मुख्यमंत्री आदिबासी ही रहे अलबता उनके जीवन में कोई परिवर्तन नई हुआ । वही धक् के तिन पात। इसपर कोई बात करना नही चाहता चाहे वो सत्ता नसीन लोग हों या तताकथित बुद्धिजीवी सब कि जबान को लकवा मर जाता है । खैर अब कुछ माह के उठा पटक के बाद वहां फिर सरकार बनी है .आब देखना दिलचस्प होगा कि बैसखिओं के बल चलने वाली सरकार इस बार कितने चौकड़ी भरती है .फिलवक्त कि राजनीती भाजपा और विशेष रूप से गडकरी अर्जुन पर ही विस्वास दिखाया है .लाख काकः के बाद मुंडा वहां तक पहुचे हैं .अर्जुन मुंडा कि पृष्ठभूमि किसानो कि रही है और वो राजनीती में मझे बहरहाल वो जानते हैं कि सियाशत के किस मेध पर कितनी मिटटी चढ़ानी है .सरकार भले ही विस्वास मत हासिल कर ली हो पर अब विभागों के बटवारे पर कपर फुतौएल अभी बाकि है .रोज मुख्यमंत्री आवास के चखर लगाये जा रहे हैं । सरे नेता लबलबाए हुआ हैं । सूबे में परेशानिया कम होने का नाम नई ले रही भारस्ताचार ,नक्सलवाद और कई सवाल मुह बाये खड़े हैं .सबसे बड़ी चुनौती तो पंचायती है .शिबू शर्कर ने वडा तो किया पर सरकार गिर गये थी .यहाँ अब जनता सती सरकार कहती है यह विडंबना ही है कि प्राकृतिक रूप से धनाड्य राज्य कि जनता और जनतंत्र अपने दिन बहुरने कि रह देख रही है और जो तारणहार हैं वो अपनी बपौती समझ कर सारा राज्य कि सम्पति बेचने पर आमादा हैं .कुछ दिनों पहले जब सरकार गिरी थी तो फिर साकार बनने कि उमीद नई थी परन्तु जिस तरह से बाघ के बच्चे के मुह एक बार खून लग जाए तो वो हमेसा खोजता है और झारखण्ड के विधायकों के मुह पैसा लग गया है .जो थूकम फिजिहत भाजपा कि हुई उसकी सायद भरपाए अब कम से ही हो .अब राज्य को नेता बकाये भाजपा को तो सायद राम बचा ही लेंगे .
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