भारत आयोगों और योजनाओं का देश है । मसलन एक योजना १९७३- ७४ में भी बनी । हर पाच साल के बाद बताया जाता है की देश में गरीबी घाट रही है । पिछले साल बतया गया की भारत में गरीबों की संख्या घाट रही है यह छप्पन प्रतिसत से घट कर छबीस प्रतिशत रह गये है । योजना आयोग की यह दलील सुप्रीम कोर्ट को नागवार गुजरी उसने हस्तछेप करते हुए तलब किया । तब कहीं जाकर उसके सुर बदले और आंकड़ा फिर इकतालीस से छप्पन के बिच झूलने लगा ।
दूसरा आंकड़ों की जादूगरी देखिये हर साल सरकार कहती है हम किसानों का कड़ोरों का बैंक ऋण माफ़ कर रहे हैं । यह महज फ़साना ही है इसका पता तब चलता है जब १९९८ से अब तक का रिकॉर्ड देखें । इस सोलह साल में ढाई लाख किसानो ने आत्महत्या की । यहाँ ये सवाल मौजूं है की ये कड़ोरों रूपये जाते कहां हैं । जब इसके जड़ों को खोदें तब पता चलता है की इस पैसे की बन्दर बाँट सियासी रसूख दर करते हैं या सत्ता के चाटुकार । यह सभी को पता है की किसान को कभी बैंकों से लोने मिलता ही नही । यह मुनादी बस अपने पोलिटिक्स मयलेज़ के लिए होता है ।
आज दंभ भरा जाता है की हम विश्व के दुसरे सबसे तेजी से उभरते हुये अर्थव्यवथा वाले देश हैं। एक भारतीय होने के नाते सब को गरवान्वित होना चाहिए । परन्तु कहीं पढ़ा की जी ड़ी पी रेट गिर कर तक़रीबन साडे छह होगया है । ये जो दावे हैं मुझे समझ नही आते क्यूँ की मुझे पता ही नही चलता की जो कुछ हो रहा है जिस तरह के दावे किये जा रहे हैं वह आंकड़ों की बाजीगरी है या फिर राजनीति का तिरया चरित्र । जो लोगों को अमूमन समझ ही नही आता । इसके बावजूद नारा दिया जाता है'' हो रहा भारत निर्माण ''। आम जनता पूछना चाहती है की भारत निर्माण कहां हो रहा है आज भी गरीबी का आंकड़ा कम नही हुआ , हांथों को काम नहीं है। हाँ भारत निर्माण तो हुआ है स्विस बैंक में ,भारत निर्माण हुआ है ,सांसद और नेताओं के निजी जीवन में ,भारस्ताचार में ।
बहरहाल गुस्सा सरे देश में है ,और ऐसे में कोई अन्ना हजारे जैसा समाजसेवी सड़क पर मसाल लेके भारस्ताचार के खिलाफ अलख जगाने सड़क तक आता है तो किसी को आश्चर्य करने की जरूरत नहीं है । आज अन्ना की आवड बुलंद है क्यूँ की अपनी संसद नहीं बोलती । समय रहते चीजें पारदर्शी नही हुई तो सरकार के रस्ते में दुस्वारियां और बढेंगी । तो जरूरी है की कम को कागज से उतर कर मूर्त रूप दिया जाये । जिस दिन हर प्रतिनिधि जवाबदेह हो जायेगा चीजें प्रत्यक्ष रूप से साथ पर होंगी उसी दिन से सही मायनों में भारत निर्माण की नीव राखी जाएगी ।
रविवार, 4 दिसंबर 2011
लोकतंत्र का एक ओजार
लोकतंत्र हर शासन तंत्र सबसे पारदशी मणि जाती है । तो ये जाहिर है की इस पारदर्शिता में और जनता के विस्वास को गढ़ने में कई चीजों का उपयोग होता होगा । सूचना का अधिकार उसी पारदर्शिता को उभरने में या कहें उसी विस्वास के नये भूगोल गढ़ने में एक कड़ी सरीखा है ।
सूचना का अधिकार हमेशा चर्चा के केंद्र में रहा है , चाहे वो शैला मसूद के मामले में रहा हो या फिर २ जी के मामले में या फिर प्रणब मुखर्जी की चिठ्ठी उजागर करने में । आज भी कई लोग इश्क इस्तेमाल नहीं करते परन्तु जितने लोग करते हैं वो सराहना के काबिल हैं । हाँ कई बार ऐसा होता है की सही सूचना नै दी जाती । सत्ता पक्ष के लिए कई बार ये गले की हड्डी साबित हुई है ।
मसलन कारपोरेट मामलों के मंत्री वीरपा मोइली और कानून मंत्री सलमान खुशीद के बयानों से ये साफ हो जाता है की ये कोरस में क्या कहना चाहते हैं । दोनों का मन्ना है की आर टी आई के बेजा इस्तेमाल से संस्थाओं के कामकाज पर असर पड़ता है । इन मंत्रिओं के इस बयान से कुछ हो न हो उनके हौसले जरुर बुलंद होंगे जिन्होंने सूचना के अधिकार के ताहत sउचना देने में ताल मटोल की हो । भले ही इन्होने संसोधन की बात न की हो परन्तु उन लोगों के लिए सोने पे सुहागा है जो लगातार इस हथियार को कुंद करने को प्रयास रत हैं । आज जिस तरह से इश्क इस्तेमाल और इसके प्रति जागरूकता फ़ैल रहा है वो सुखद है हर भारतीय के लिए ।
प्रश्न उठता है की क्या इसकी जरूरत थी ? तो आज के समकालीन दौर में जिस तरह से राजनीती लामबंद हुई है , उसी लामबंदी को तोड़ने में इसका इस्तेमाल किया जा रहा है ,नही तो जिस तरह के घोटाले हो रहे हैं उनकी कलाई कभी नै खुलती ।
प्रणब मुखर्जी के चिठ्ठी जब सुब्रमण्यम स्वामी ने निकलवाई तो सलमान खुर्शीद ने स्वामी को आड़े हांथों लिया और कहा की कोई मंत्री प्रधानमंत्री को गोपनीय चिठ्ठी लिखता है तो उसे साझा या सार्वजनिक क्यूँ की जानी चाहिए ?
ये बयान बचकाना इसलिए है की यहाँ सवाल की मंत्री और नेता नही है यहाँ सवाल पुरे देश का है और अगर खिन ऐसी खिचड़ी पकती है तो उससे सार्वजनिक होना ही चाहिए । आप जनता के प्रति निधि है उसके प्रति आपको जवाबदेह होना है ।
पुरवा सूचना आयुक्त वजाहत हबिबुलाह ने मोइली और खुर्शीद की टिप्णियों पर प्रतिकार किया है ,और सलाह देते हुए कहा है की इससे घबराने की जरूरत नही । इसे प्रशासन को मजबूत करने के औजार के रूप में देखना चाहिए न की हथियार के रूप में ।
बहरहाल यहाँ ये देखना दिलचस्प होगा की जो सरकार पारदशी और जवाबदेह प्रशासन का डंका पीट पीट नही थकती आज उसी के कई मंत्रिओं के दम फूल रहे हैं ।
सूचना का अधिकार हमेशा चर्चा के केंद्र में रहा है , चाहे वो शैला मसूद के मामले में रहा हो या फिर २ जी के मामले में या फिर प्रणब मुखर्जी की चिठ्ठी उजागर करने में । आज भी कई लोग इश्क इस्तेमाल नहीं करते परन्तु जितने लोग करते हैं वो सराहना के काबिल हैं । हाँ कई बार ऐसा होता है की सही सूचना नै दी जाती । सत्ता पक्ष के लिए कई बार ये गले की हड्डी साबित हुई है ।
मसलन कारपोरेट मामलों के मंत्री वीरपा मोइली और कानून मंत्री सलमान खुशीद के बयानों से ये साफ हो जाता है की ये कोरस में क्या कहना चाहते हैं । दोनों का मन्ना है की आर टी आई के बेजा इस्तेमाल से संस्थाओं के कामकाज पर असर पड़ता है । इन मंत्रिओं के इस बयान से कुछ हो न हो उनके हौसले जरुर बुलंद होंगे जिन्होंने सूचना के अधिकार के ताहत sउचना देने में ताल मटोल की हो । भले ही इन्होने संसोधन की बात न की हो परन्तु उन लोगों के लिए सोने पे सुहागा है जो लगातार इस हथियार को कुंद करने को प्रयास रत हैं । आज जिस तरह से इश्क इस्तेमाल और इसके प्रति जागरूकता फ़ैल रहा है वो सुखद है हर भारतीय के लिए ।
प्रश्न उठता है की क्या इसकी जरूरत थी ? तो आज के समकालीन दौर में जिस तरह से राजनीती लामबंद हुई है , उसी लामबंदी को तोड़ने में इसका इस्तेमाल किया जा रहा है ,नही तो जिस तरह के घोटाले हो रहे हैं उनकी कलाई कभी नै खुलती ।
प्रणब मुखर्जी के चिठ्ठी जब सुब्रमण्यम स्वामी ने निकलवाई तो सलमान खुर्शीद ने स्वामी को आड़े हांथों लिया और कहा की कोई मंत्री प्रधानमंत्री को गोपनीय चिठ्ठी लिखता है तो उसे साझा या सार्वजनिक क्यूँ की जानी चाहिए ?
ये बयान बचकाना इसलिए है की यहाँ सवाल की मंत्री और नेता नही है यहाँ सवाल पुरे देश का है और अगर खिन ऐसी खिचड़ी पकती है तो उससे सार्वजनिक होना ही चाहिए । आप जनता के प्रति निधि है उसके प्रति आपको जवाबदेह होना है ।
पुरवा सूचना आयुक्त वजाहत हबिबुलाह ने मोइली और खुर्शीद की टिप्णियों पर प्रतिकार किया है ,और सलाह देते हुए कहा है की इससे घबराने की जरूरत नही । इसे प्रशासन को मजबूत करने के औजार के रूप में देखना चाहिए न की हथियार के रूप में ।
बहरहाल यहाँ ये देखना दिलचस्प होगा की जो सरकार पारदशी और जवाबदेह प्रशासन का डंका पीट पीट नही थकती आज उसी के कई मंत्रिओं के दम फूल रहे हैं ।
शुक्रवार, 28 जनवरी 2011
एन. आर. आई. सम्मेलन में यमला पगला दीवाना

एन. आर. आई. सम्मेलन में भारत सरकार ने प्रवासी भारतियों लिए विशेष सुविधाओं का प्रावधान किया है। अपना देश अपनी माटी तथा अपनी संस्कृति के प्रति लगाव होना स्वाभाविक है। इस देश से बाहर जाकर भारत भारतीयता की सुगंध बिखरने वाले महर्षि अरंविद और स्वामी विवेकानंद ने तो कण-कण को अपना आराध्य माना था। निर्माता समीर कर्णिक ने हास्य के माध्यम से ‘यमला पगला दीवाना’ में इन्हीं विषयों को छूने का प’यास किया है।
कहानी में एक मोड़ तब आता है जब गजोधर सिंह का पंजाब से वाराणसी में लेखन करने आयी साहिबा से प्रेम हो जाता है। जिसके पांचो भाई इस शादी के खिलाफ हैं। वो तो अपनी बहन की शादी एन. आर. आई. से ही करना चाहते हैं। फिर धीरे-धीरे पूरा परिवार मिल जाता है। संपूर्ण कहानी में हास्य का अथाह सागर दिखाई पड़ता है।
एक जमाना था जब धर्मेंद’, शत्रुघ्न सिंहा और अमिताभ बच्चन की तुती बोलती थी। फिर 80 से 90 के दशक में सन्नी देओल, बॉबी देओल ने भी दर्शकों को पर्दे पर लुभाया। लेकिन अमिताभ बच्चन का जलवा आज भी कायम है। वो तो ”यंग्री ओल्ड मैन” हैं। एक्टिंग के मामले में सन्नी देओल को तुलनात्मक दृष्टि से ठीक कहा जा सकता है।
फिल्म का तकनीकी पक्ष एवं गीत-संगीत पक्ष को औसत दर्जे का कहा जा सकता है। यह फिल्म दर्शकों को हंसी-मजाक के साथ-साथ तथा एन. आर. आई. के संबंध में ठीक प्रकार से दिखाने में कामयाब हुई है।
रविवार, 23 जनवरी 2011
असीमानंद से स्वामी असीमानंद

विगत दिनों जब राजस्थान एसटीएफ़ और सीबीआई ने मालेगांव बलोस्ट, अजमेर बलोस्ट, मक्का मसजिद और समझौता एक्सप्रेस के कथित आरोपियों के खिलाफ वांछित सबूतों को अपने-अपने ट्रैक पर तेजी से तलाशना शुरू किया और तत्पश्चात संघ से जुड़े कुछ कार्यकर्ताओं के नाम; वातावरण में प्रतिध्वनित होने लगे; तो संघ परिवार-भाजपा, वीएचपी, तथा शिवसेना ने इसे हिंदुत्व के खिलाफ साजिश करार दिया था. उनके पक्ष का मीडिया और संत समाजों की कतारों से भी ऐसी ही आक्रामक प्रतिक्रिया निरंतर आती रही हैं; जब इस साम्प्रदायिक हिंसात्मक नर संहार के एक अहम सूत्रधार (असीमानंद) ने अपनी स्वीकारोक्ति न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष दी तो एक बारगी मेरे मन में भी यह प्रश्न उठा कि यह स्वीकारोक्ति बेजा दवाव में ही सम्पन्न हुई है ….
उधर देश और दुनिया की वाम जनतांत्रिक कतारों ने समवेत स्वर में जो-जो आरोप, जिन-जिन पर लगाए थे वे सभी आज सच सावित हो रहे हैं. आज देश के तमाम सहिष्णु हिन्दू जनों का सर झुका हुआ है; मात्र उन वेशर्मों को छोड़कर जो प्रतिहिंसात्म्कता की दावाग्नि में अपने विवेक और शील को स्वःहा कर चुके हैं. उन्हें तो ये एहसास भी नहीं कि-दोनों दीन से गए …..जिन मुस्लिम कट्टरपंथियों को सारा संसार और समस्त प्रगतिशील अमन पसंद मुसलिम जगत नापसंद कर्ता था; वे अब सहानुभूति के पात्र हो रहे हैं, और जिन सहिष्णु हिन्दुओं ने ”अहिंसा परमोधर्मः ”या मानस की जात सब एकु पह्चान्वो ….या सर्वे भवन्तु सुखिनः कहा वे बमुश्किल आधा दर्जन दिग्भ्रमित कट्टर हिंदुत्व वादियों कि नालायकी से सारे सभ्य संसार के सामने शर्मिंदा हैं.
शनिवार, 22 जनवरी 2011
कांग्रेस मतलब परिवारवाद

भारत में हम हिन्दुओं को जहां वेलेंटाइन डे, फ्रेंडशिप डे मनाने से ही फुरसत नहीं है लेकिन देश से दूर कुछ लोग लगातार हमारी संस्कृति और धर्म के संवर्धन में जुटे हुए हैं.इन्ही में से एक है विलायत में हिन्दू लीडर के रूप ख्यात श्री राजन जेद. उन्होंने हाल ही में विश्वभर में हिन्दुओं को परमपरागत विधी से गुरू-पूर्णिमा उत्सव उत्साह से मनाने का आह्वान किया है. जो की एक अच्छी खबर है.इसी तरह महिला दिवस भी हम मनाते है. किसकी याद में मालूम नहीं लेकिन मनाते है. जबकि नारीशक्ति की वन्दना और शुक्रगुजार होने के लिए दुर्गाष्ठमी से बेहतर कोई भी दिन महिला दिवस के लिए उपयुक्त नहीं हो सकता है.ठीक इसी तरह भारत की आने वाली पीढी यानी बच्चो की सुरक्षा, सम्पन्नता को दांव पे लगाने वाले नेहरू का जन्मदिन हम बालदिवस के रूप में मनाते हैं, जबकि असली भारतीय बाल दिवस तो जन्माष्ठमी है! एक तरफ बच्चो के दिवस में चाचा नेहरू अपनी टांग फंसाए बैठे है, वही देशभर में संचालित नेहरू युवाकेंद्र भी उनको समर्पित है. धन्य है नेहरू जो बाल और युवा दोनों की दुनिया में विराजमान है. अगर कोई सेक्स डे या व्याभिचार दिवस होता तो वहा भी उनके नाम ही होता!! खैर, सोचो तो विवेकानंद युवा केंद्र ज्यादा मुनासिब था..
शहीद दिवस शहीद भगत सिंह के नाम पर और आंतकवाद विरोधी दिवस श्यामाप्रसाद मुखर्जी के नाम पर होना चाहिए लेकिन..इस पर भी गांधी-नेहरू वंश का कब्जा है.आनेवाले दिनों में राहुल, प्रियंका, उनके बेटे-बेटियों. रॉबर्ट वढेरा के जन्मदिन भी किसी दिवस के रूप में मनाये जाए तो हैरत की बात नहीं.
यानी ये जो देश है..सिर्फ नेहरू-गांधी के कारण ही है. यही इसका इतिहास और भविष्य है. बाकी किसी ने कुछ नहीं किया. ध्यान रहे यह कोई मामूली बात नहीं बल्कि आगामी पीढी पर एक तरह के मनोवैज्ञानिक जानकारी लादने का प्रयास है. इस सवाल को जा तक किसी भी एन जी ओ ने नहीं उठाया ..किसी तीस्ता ने इस बेशर्मी के लिए कोर्ट का दरवाजा नहीं खटखटाया. किसी मीडिया ने कवर स्टोरी नहीं बनाई .
भारत के लोकतान्त्रिक राजवंश का सरकारी योजनाओं अथवा विभिन्न सार्वजनिक उपक्रमों के माध्यम से जनता का जनार्दन बनने कोशिश से जुडे कुछ तथ्य पेश किये जा रहे हैं | इसे अवश्य पढ़िये और देखिये किस तरह नामकरण के प्रभाव से जनमानस को नई मानसिक गुलामी की बेड़ियों में जकड़ा जा रहा है |
मंगलवार, 18 जनवरी 2011
आई.ओ.सी. के डिपो में आग,कोई हताहत नहीं..
मुंबई के बाहरी इलाके में स्थित इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन के एक लुब्रिकेंट फिलिंग डिपो में लगी आग पर कुछ ही घंटों में नियंत्रण पा लिया गया।
आईओसी के अध्यक्ष बी एम बंसल ने नई दिल्ली में एक संवाददाता सम्मेलन में बताया, 'आग लगने की घटना में कोई घायल नहीं हुआ है।'
मुंबई के बाहरी इलाके तालोजा स्थित इस डिपो में डिब्बों में भरने के लिए लुब्रिकेंट ऑयल था। यहां कच्चा तेल नहीं था।
बंसल ने बताया कि आग लगने की जानकारी रात लगभग डेढ़ बजे मिली और इस पर सुबह लगभग साढ़े सात बजे तक पूरी तरह काबू पा लिया गया। उन्होंने बताया कि डिपो में सुबह आठ बजे से शाम पांच बजे तक काम होता है और आग लगने के समय यह बंद था।
बंसल के मुताबिक, 'संयंत्र में अन्य सभी स्टोरेज टैंक फार्म्स, उत्पादन इकाइयां, प्रयोगशाला और अग्निशमन उपकरण सुरक्षित हैं।' मुंबई में एक अग्निशमन अधिकारी ने बताया कि आग की शुरूआत लुब्रिकेंट ऑयल से भरे डिब्बों से हुई।
बंसल ने बताया कि सुरक्षा में तैनात जवानों ने रात लगभग डेढ़ बजे आग लगने की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि शुरूआती रिपोर्ट से पता चलता है कि आग का कारण इलेक्ट्रिकल शॉर्ट सर्किट था।
उन्होंने कहा कि आग का सही कारण और नुकसान का वास्तविक आकलन आग के ठंडे होने का अभियान पूरा होने के बाद हो सकेगा।
मुंबई के बाहरी इलाके में स्थित इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन के एक लुब्रिकेंट फिलिंग डिपो में लगी आग पर कुछ ही घंटों में नियंत्रण पा लिया गया।
आईओसी के अध्यक्ष बी एम बंसल ने नई दिल्ली में एक संवाददाता सम्मेलन में बताया, 'आग लगने की घटना में कोई घायल नहीं हुआ है।'
मुंबई के बाहरी इलाके तालोजा स्थित इस डिपो में डिब्बों में भरने के लिए लुब्रिकेंट ऑयल था। यहां कच्चा तेल नहीं था।
बंसल ने बताया कि आग लगने की जानकारी रात लगभग डेढ़ बजे मिली और इस पर सुबह लगभग साढ़े सात बजे तक पूरी तरह काबू पा लिया गया। उन्होंने बताया कि डिपो में सुबह आठ बजे से शाम पांच बजे तक काम होता है और आग लगने के समय यह बंद था।
बंसल के मुताबिक, 'संयंत्र में अन्य सभी स्टोरेज टैंक फार्म्स, उत्पादन इकाइयां, प्रयोगशाला और अग्निशमन उपकरण सुरक्षित हैं।' मुंबई में एक अग्निशमन अधिकारी ने बताया कि आग की शुरूआत लुब्रिकेंट ऑयल से भरे डिब्बों से हुई।
बंसल ने बताया कि सुरक्षा में तैनात जवानों ने रात लगभग डेढ़ बजे आग लगने की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि शुरूआती रिपोर्ट से पता चलता है कि आग का कारण इलेक्ट्रिकल शॉर्ट सर्किट था।
उन्होंने कहा कि आग का सही कारण और नुकसान का वास्तविक आकलन आग के ठंडे होने का अभियान पूरा होने के बाद हो सकेगा।
गरीबों को है आशियाने की आस!
झारखंड में बेसिक सर्विसेज फार अर्बन पीपुल और इंटीग्रेटेड स्मॉल हाउसिंग डेवलपमेंट प्रोग्राम (आईएचएसडीपी) का हाल बेहाल है। दोनों ही योजनाओं के तहत शहरी क्षेत्रों में निवास करने वाले बीपीएल परिवारों को आवास मुहैया कराया जाना है, परंतु कहीं पुनर्वास की भूमि उपलब्ध नहीं रहने तो कहीं अधिकारियों की उदासीनता की वजह से यह योजना दम तोड़ती नजर आती है। दक्षिणी छोटा नागपुर मंडल के रांची जिले की बात करें तो बीएसयूपी के फेज एक से छह तक के लिए निकाली गई निविदा में महज तीन एजेंसियों ने ही दिलचस्पी दिखाई। रांची नगर निगम के मुख्य कार्यपालक पदाधिकारी की सुने तो पुनर्वास की भूमि उपलब्ध नहीं रहने से तंग बस्तियों में रहने वाले लाभुक वर्तमान भूमि खाली करना नहीं चाहते, जिससे निर्माण कार्य बाधित हैं। इसी तरह उत्तरी छोटानागपुर मंडल की बात करें तो आईएचएसडीपी योजना के तहत फुसरो नगर परिषद में 886 के विरुद्ध 127 लाभुकों का ही चयन अब तक हो सका है। गिरीडीह में 1132 के सापेक्ष 644, हजारीबाग में 1230 के मुकाबले 1096 लाभुकों का ही चयन हो सका है। कोल्हान मंडल के चाईबासा में 736 के सापेक्ष 665 लाभुकों का सर्वेक्षण तो हुआ, परंतु 159 लोगों के बीच ही राशि का भुगतान किया गया। पलामू मंडल के मेदिनीनगर पंचायत में पुनरीक्षित प्राक्कलन का पेंच फंसा है.
झारखंड में बेसिक सर्विसेज फार अर्बन पीपुल और इंटीग्रेटेड स्मॉल हाउसिंग डेवलपमेंट प्रोग्राम (आईएचएसडीपी) का हाल बेहाल है। दोनों ही योजनाओं के तहत शहरी क्षेत्रों में निवास करने वाले बीपीएल परिवारों को आवास मुहैया कराया जाना है, परंतु कहीं पुनर्वास की भूमि उपलब्ध नहीं रहने तो कहीं अधिकारियों की उदासीनता की वजह से यह योजना दम तोड़ती नजर आती है। दक्षिणी छोटा नागपुर मंडल के रांची जिले की बात करें तो बीएसयूपी के फेज एक से छह तक के लिए निकाली गई निविदा में महज तीन एजेंसियों ने ही दिलचस्पी दिखाई। रांची नगर निगम के मुख्य कार्यपालक पदाधिकारी की सुने तो पुनर्वास की भूमि उपलब्ध नहीं रहने से तंग बस्तियों में रहने वाले लाभुक वर्तमान भूमि खाली करना नहीं चाहते, जिससे निर्माण कार्य बाधित हैं। इसी तरह उत्तरी छोटानागपुर मंडल की बात करें तो आईएचएसडीपी योजना के तहत फुसरो नगर परिषद में 886 के विरुद्ध 127 लाभुकों का ही चयन अब तक हो सका है। गिरीडीह में 1132 के सापेक्ष 644, हजारीबाग में 1230 के मुकाबले 1096 लाभुकों का ही चयन हो सका है। कोल्हान मंडल के चाईबासा में 736 के सापेक्ष 665 लाभुकों का सर्वेक्षण तो हुआ, परंतु 159 लोगों के बीच ही राशि का भुगतान किया गया। पलामू मंडल के मेदिनीनगर पंचायत में पुनरीक्षित प्राक्कलन का पेंच फंसा है.
नेता बनाम चरित्र
ऐसा हम सब जानते हैं की राजनेता और राजनेति यहाँ हमेशा ही केंद्र में रही है । ऐसा कहा भी जाता है की "आम जन को और मिडिया को प्रभावित करने की खबर राजनीती के गर्व से ही आती हैं " । कुछ दिनों पहले बिहार में हुआ विधायक हत्या कांड ने वहां राजनीती के गलियारों में सरगर्मी बढ़ा दी है । साथ ही साथ जन्प्रतिनिधिओन के चरित्र को लेकर बहस भी साथ पर आगये है
ऐसा नहीं की यह पहली बार हुआ है यह हमारे देश की राजनेत में होता रहा है । बिहार , उतर प्रदेश , झारखण्ड aadi प्रदेशों में पपू यादव ,अनूप संदा सरीखे विधायक मौजूद हैं ,जो नहीं राजनितिक लक्ष्मण रेखा की परवाह करते हैं और नहीं सामाजिक मर्यादा की फ़िक्र । ये हमेशा अपने ओहदे और रशुख का गलत इस्तेमाल करते हैं ।
अगर समकालीन राजनीती को देखें तो पता चलता है की राजनीती और अपराध एक दुसरे का पर्याय बन गया है , इश्क खुलासा इससे भी होता है की बिहार के १४१ विधायक अपराधिक मामलों में संलिप्त हैं । यह खुलासा उस सपथ पत्र का है जिसे इन्ही विधायकों ने अपने चुनाव के दौरान किया था । १४१ में ८५ ऐसे विधायक हैं जिनपर संगीन मामले दर्ज हैं । रूपं महज इसमें एक कड़ी है ।
राजकिशोर की हत्या हमारे सामने एक बार फिर स्सरे राजनेता को कठघरे में खड़ा कर उनके पुरे चरित्र को उभर रहा है ।
ऐसा नही की इस हमाम में शिर्फ़ राजकिशोर ही नंगे हैं । जरूरत है एक दफा खंघालने की कलाई खिद ब खुद उतर जाएगी । सवाल यह है की जिस प्रतिनिधि को wah चुनती है , अपने दिन बहुरने की मनसा रखती है और अगर वही उसका चारित्रिक हनन करेगा तो जनता अपनी गुहार खान लगाये गी । जिस तरह से हमारे नेता व्यभिचारी होते जा रहे हैं वह चिंता का विषय है । जिस तरह ये सत्ता को भोगना चाहते हैं , कानून को अपने घर की रखैल समझते हैं ,जरूरत है उनके सामने वो झांझर सी दिवार गिराने की और उन्हें उनके होने का अहसास दिलाने की उनकी अहमियत बताने की ।
आज जिस तरह से राजनीती पथ विमूढ़ हो रही है उसे ध्यान में रखते हिया ऐसा लगता है की राजनीती की नए परिभाषा गढ़नी पड़ेगी । कुछ विधायक जो चर्चित रहे ........
भगवन शर्मा .....२००८ .....आगरा की इक छात्रा के साथ बलात्कार
अमरमणि त्रिपाठी .....२००३......युवा कवायेत्री के साथ बलात्कार , हत्या
आनन्द सेन यादव .........छात्रा शशि के सैट बलात्कार ,हत्या
अनूप संदा इक मुस्लिम के साथ शादी का वादा कर , बलात्कार
ऐसा नहीं की यह पहली बार हुआ है यह हमारे देश की राजनेत में होता रहा है । बिहार , उतर प्रदेश , झारखण्ड aadi प्रदेशों में पपू यादव ,अनूप संदा सरीखे विधायक मौजूद हैं ,जो नहीं राजनितिक लक्ष्मण रेखा की परवाह करते हैं और नहीं सामाजिक मर्यादा की फ़िक्र । ये हमेशा अपने ओहदे और रशुख का गलत इस्तेमाल करते हैं ।
अगर समकालीन राजनीती को देखें तो पता चलता है की राजनीती और अपराध एक दुसरे का पर्याय बन गया है , इश्क खुलासा इससे भी होता है की बिहार के १४१ विधायक अपराधिक मामलों में संलिप्त हैं । यह खुलासा उस सपथ पत्र का है जिसे इन्ही विधायकों ने अपने चुनाव के दौरान किया था । १४१ में ८५ ऐसे विधायक हैं जिनपर संगीन मामले दर्ज हैं । रूपं महज इसमें एक कड़ी है ।
राजकिशोर की हत्या हमारे सामने एक बार फिर स्सरे राजनेता को कठघरे में खड़ा कर उनके पुरे चरित्र को उभर रहा है ।
ऐसा नही की इस हमाम में शिर्फ़ राजकिशोर ही नंगे हैं । जरूरत है एक दफा खंघालने की कलाई खिद ब खुद उतर जाएगी । सवाल यह है की जिस प्रतिनिधि को wah चुनती है , अपने दिन बहुरने की मनसा रखती है और अगर वही उसका चारित्रिक हनन करेगा तो जनता अपनी गुहार खान लगाये गी । जिस तरह से हमारे नेता व्यभिचारी होते जा रहे हैं वह चिंता का विषय है । जिस तरह ये सत्ता को भोगना चाहते हैं , कानून को अपने घर की रखैल समझते हैं ,जरूरत है उनके सामने वो झांझर सी दिवार गिराने की और उन्हें उनके होने का अहसास दिलाने की उनकी अहमियत बताने की ।
आज जिस तरह से राजनीती पथ विमूढ़ हो रही है उसे ध्यान में रखते हिया ऐसा लगता है की राजनीती की नए परिभाषा गढ़नी पड़ेगी । कुछ विधायक जो चर्चित रहे ........
भगवन शर्मा .....२००८ .....आगरा की इक छात्रा के साथ बलात्कार
अमरमणि त्रिपाठी .....२००३......युवा कवायेत्री के साथ बलात्कार , हत्या
आनन्द सेन यादव .........छात्रा शशि के सैट बलात्कार ,हत्या
अनूप संदा इक मुस्लिम के साथ शादी का वादा कर , बलात्कार
लाल चौक पर झंडा फहराना सरकार का दायित्व.
जनता पार्टी प्रमुख सुब्रमण्यम स्वामी ने केंद्र को श्रीनगर के लालचौक पर तिरंगा फहराने को लेकर दायित्व बाध्य करार देते हुए रविवार को कहा कि यदि राज्य सरकार वहां राष्ट्रीय ध्वज फहराने में सहयोग करने में विफल रहती है तो जम्मू कश्मीर में केंद्र शासन लगा दिया जाना चाहिए।
स्वामी ने यहां जारी एक बयान में कहा कि संविधान में उल्लेखित नियमों के पालना के तहत संप्रग सरकार का यह दायित्व है कि वह लाल चौक पर आधिकारिक रूप से तिरंगा फहराए।
उन्होंने कहा कि राजनीतिक मामलों की केबिनेट समिति ने वर्ष 1991 में जनवरी के पहले सप्ताह में इस संबंध में एक प्रस्ताव मंजूर किया था। उन्होंने कहा कि उस समय चंद्रशेखर प्रधानमंत्री थे और वह केंद्रीय कानून, न्याय एवं वाणिज्य मंत्री थे।
उन्होंने कहा कि वरिष्ठ मंत्री एवं सीसीपीए का सदस्य होने के नाते मैं यह मुद्दा सीसीपीए में उठाया था क्योंकि वी पी सिंह सरकार ने इस मामले पर विचार करने के बाद वर्ष 1990 में लाल चौक पर झंडा फहराने की परंपरा पर रोक लगाने का फैसला किया क्योंकि इससे राज्य की जनता की भावनाओं को ठेस पहुंच सकती थी।
स्वामी ने कहा कि चंद्रशेखर सेवा प्रमुख, गुप्तचर प्रमुखों और केबिनेट सचिव से बात करने के बाद मुझसे सहमत हुए और निर्देश दिया कि सरकार झंडा फहराए और यदि कोई समस्या खड़ी होती है तो सेना सुरक्षा मुहैया कराए।
उन्होंने कहा कि राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला ने बाद में इससे सहमति जताने के साथ ही 26 जनवरी 1991 को तिरंगा झंडा फहराए जाने के दौरान शांति व्यवस्था सुनिश्चित करने में सहयोग प्रदान किया।
उन्होंने कहा कि लाल चौक को कोई बाजार क्षेत्र नहीं बल्कि एक ऐतिहासिक स्थान है जिसे तत्कालीन मुख्यमंत्री भी स्वीकार कर चुके हैं इसलिए वह मांग करते हैं कि 26 जनवरी को वहां पर तिरंगा फहराया जाए। यदि राज्य सरकार सहयोग नहीं करती है तो राज्य में केंद्र शासन घोषित करके शासन व्यवस्था सेना को सौंप दिया जाए.
जनता पार्टी प्रमुख सुब्रमण्यम स्वामी ने केंद्र को श्रीनगर के लालचौक पर तिरंगा फहराने को लेकर दायित्व बाध्य करार देते हुए रविवार को कहा कि यदि राज्य सरकार वहां राष्ट्रीय ध्वज फहराने में सहयोग करने में विफल रहती है तो जम्मू कश्मीर में केंद्र शासन लगा दिया जाना चाहिए।
स्वामी ने यहां जारी एक बयान में कहा कि संविधान में उल्लेखित नियमों के पालना के तहत संप्रग सरकार का यह दायित्व है कि वह लाल चौक पर आधिकारिक रूप से तिरंगा फहराए।
उन्होंने कहा कि राजनीतिक मामलों की केबिनेट समिति ने वर्ष 1991 में जनवरी के पहले सप्ताह में इस संबंध में एक प्रस्ताव मंजूर किया था। उन्होंने कहा कि उस समय चंद्रशेखर प्रधानमंत्री थे और वह केंद्रीय कानून, न्याय एवं वाणिज्य मंत्री थे।
उन्होंने कहा कि वरिष्ठ मंत्री एवं सीसीपीए का सदस्य होने के नाते मैं यह मुद्दा सीसीपीए में उठाया था क्योंकि वी पी सिंह सरकार ने इस मामले पर विचार करने के बाद वर्ष 1990 में लाल चौक पर झंडा फहराने की परंपरा पर रोक लगाने का फैसला किया क्योंकि इससे राज्य की जनता की भावनाओं को ठेस पहुंच सकती थी।
स्वामी ने कहा कि चंद्रशेखर सेवा प्रमुख, गुप्तचर प्रमुखों और केबिनेट सचिव से बात करने के बाद मुझसे सहमत हुए और निर्देश दिया कि सरकार झंडा फहराए और यदि कोई समस्या खड़ी होती है तो सेना सुरक्षा मुहैया कराए।
उन्होंने कहा कि राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला ने बाद में इससे सहमति जताने के साथ ही 26 जनवरी 1991 को तिरंगा झंडा फहराए जाने के दौरान शांति व्यवस्था सुनिश्चित करने में सहयोग प्रदान किया।
उन्होंने कहा कि लाल चौक को कोई बाजार क्षेत्र नहीं बल्कि एक ऐतिहासिक स्थान है जिसे तत्कालीन मुख्यमंत्री भी स्वीकार कर चुके हैं इसलिए वह मांग करते हैं कि 26 जनवरी को वहां पर तिरंगा फहराया जाए। यदि राज्य सरकार सहयोग नहीं करती है तो राज्य में केंद्र शासन घोषित करके शासन व्यवस्था सेना को सौंप दिया जाए.
सोमवार, 17 जनवरी 2011
जल निकासी की व्यवस्था लचर,जल्द होंगे नए इंतजामात!......
योजनाओं के कार्य प्रगति पर हैं। जल्द ही जल निकासी की व्यवस्था होगी। संबंधित अधिकारियों से जब भी शहरी क्षेत्र में जल निकासी की व्यवस्था के संबंध में पूछा जाता है तो उनकी जुबान पर उक्त कथन मौजूद रहते हैं। लेकिन हकीकत कुछ और ही है। सरकारी दावे और घोषणाओं के बावजूद समस्तीपुर शहर में अभी तक जलनिकासी की पर्याप्त व्यवस्था नहीं हो पायी है। इस कारण बारिश के दिनों में दर्जनों सड़कें नरक में तब्दील हो जाती है। नगर परिषद एक बार फिर दर्जनों योजनाओं का चयन कर जल निकासी की व्यवस्था करने की बात कह रही है। मगर विगत सुशासन के पांच साल में स्थिति जस की तस रही। यहां बताते चलें कि करीब तीन वर्ष पूर्व नालों के निर्माण के लिए लगभग दस करोड़ की योजनाएं स्वीकृत हुई । जिसमें थानेश्वर मंदिर से ताजपुर रोड होते हुए दुधपुरा स्थित मंडल कारा से जमुआरी नदीऔर थानेश्वर मंदिर से कलक्ट्रेट होते हुए क्रांति होटल तक का नाला निर्माण कब शुरू होगा, कहना मुश्किल है। करीब तीन लाख की आबादी वाले समस्तीपुर शहर में प्रत्येक दिन लाखों लीटर गंदा पानी निकल रहा है, जो किसी तरह बूढ़ी गंडक व जमुआरी नदी में जा रहा है। साथ हीे सड़कों पर बह रहा है। इस संबंध में पूछे जाने पर नगर परिषद के ईओ सत्य प्रकाश शर्मा बताते हैं कि मुख्यमंत्री शहरी विकास योजना के तहत कई योजनाओं का चयन हुआ है। पचास लाख की लागत से आजाद चौक से भोला टाकीज गुमटी होते हुए अनिल गुप्ता की दुकान तक पक्का नाला निर्माण उत्तरी साइड में बनाया जाएगा। वहीं नगर परिषद बाजार से दाहो बाबू के गैरेज तक पक्का नाला निर्माण, जीर्णोद्धार व ऊंचीकरण लगभग 60 लाख की लागत से कराया जायेगा। यह कार्य सड़क के दक्षिण साइड में होगा। बहरहाल, देखना यह है कि स्वीकृत योजनाओं पर कार्य कब तक शुरू होगा।
योजनाओं के कार्य प्रगति पर हैं। जल्द ही जल निकासी की व्यवस्था होगी। संबंधित अधिकारियों से जब भी शहरी क्षेत्र में जल निकासी की व्यवस्था के संबंध में पूछा जाता है तो उनकी जुबान पर उक्त कथन मौजूद रहते हैं। लेकिन हकीकत कुछ और ही है। सरकारी दावे और घोषणाओं के बावजूद समस्तीपुर शहर में अभी तक जलनिकासी की पर्याप्त व्यवस्था नहीं हो पायी है। इस कारण बारिश के दिनों में दर्जनों सड़कें नरक में तब्दील हो जाती है। नगर परिषद एक बार फिर दर्जनों योजनाओं का चयन कर जल निकासी की व्यवस्था करने की बात कह रही है। मगर विगत सुशासन के पांच साल में स्थिति जस की तस रही। यहां बताते चलें कि करीब तीन वर्ष पूर्व नालों के निर्माण के लिए लगभग दस करोड़ की योजनाएं स्वीकृत हुई । जिसमें थानेश्वर मंदिर से ताजपुर रोड होते हुए दुधपुरा स्थित मंडल कारा से जमुआरी नदीऔर थानेश्वर मंदिर से कलक्ट्रेट होते हुए क्रांति होटल तक का नाला निर्माण कब शुरू होगा, कहना मुश्किल है। करीब तीन लाख की आबादी वाले समस्तीपुर शहर में प्रत्येक दिन लाखों लीटर गंदा पानी निकल रहा है, जो किसी तरह बूढ़ी गंडक व जमुआरी नदी में जा रहा है। साथ हीे सड़कों पर बह रहा है। इस संबंध में पूछे जाने पर नगर परिषद के ईओ सत्य प्रकाश शर्मा बताते हैं कि मुख्यमंत्री शहरी विकास योजना के तहत कई योजनाओं का चयन हुआ है। पचास लाख की लागत से आजाद चौक से भोला टाकीज गुमटी होते हुए अनिल गुप्ता की दुकान तक पक्का नाला निर्माण उत्तरी साइड में बनाया जाएगा। वहीं नगर परिषद बाजार से दाहो बाबू के गैरेज तक पक्का नाला निर्माण, जीर्णोद्धार व ऊंचीकरण लगभग 60 लाख की लागत से कराया जायेगा। यह कार्य सड़क के दक्षिण साइड में होगा। बहरहाल, देखना यह है कि स्वीकृत योजनाओं पर कार्य कब तक शुरू होगा।
रविवार, 16 जनवरी 2011
सिटी घोटाला: अब होगी चौ-तरफा जांच......
सिटी बैंक की गुड़गांव शाखा में 400 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी मामले में रिजर्व बैंक इस बात की जांच कर रहा है कि क्या इस संबंध में ग्राहकों की जांच और खातों पर नजर रखने के नियमों की अनदेखी हुई है।
सूत्रों के अनुसार शीर्ष बैंक की शुरूआती जांच में यह संकेत मिला है कि सिटी बैंक में लगभग एक दर्जन खातों के जरिए करोड़ों रुपये का लेनदेन हुआ। इन खातों को मुख्य आरोपी शिवराज पुरी द्वारा परिचालित किए जाने की आशंका है।
इनमें से कुछ खाते सिटी बैंक के उप ग्राहकों के थे जो धोखाधड़ी के शिकार हुए। जबकि कुछ खाते पुरी ने अपने संबंधित या काल्पनिक लोगों के नाम पर खोले थे।
रिजर्व बैंक इस बात का पता लगा रहा है कि क्या सिटी बैंक ने अपने ग्राहकों को जानें [केवाईसी] नियमों के पालन के बाद इन खातों को खोलने की अनुमति दी। इसके तहत ग्राहकों की जांच अनिर्वाय है। इसके लिए वैध पहचान पत्र और पैन कार्ड पासपोर्ट जैसे जरूरी कागजात के साथ घर के पते का प्रमाणपत्र शामिल हैं।
नियमों के तहत बैंकों के लिए यह भी अनिवार्य है कि वे ग्राहकों की भौतिक रूप से जांच करें।
सूत्रों के मुताबिक इसके अलावा, केंद्रीय बैंक इस बात का पता लगाने की भी कोशिश कर रहा है कि क्या सिटी बैंक ने संदिग्ध सौदा रिपोर्टिंग [एसटीआर] की जांच की थी। इसके तहत बैंक को अपने किसी भी खाते च्ें उच्च और असामान्य सौदों के बारे में नियामक और प्रवर्तन एजेंसियों को जानकारी देनी होती है।
धनाढ्य व्यक्तियों के खातों के मामले में बैंकों को केवाईसी और एसटीआर नियमों का कड़ाई से पालन अनिवार्य है। सिटी बैंक मामला धनाढ्य व्यक्तियों से ही जुड़ा है जो कथित तौर पर पुरी द्वारा धोखाधड़ी के शिकार हुए।
सिटी बैंक ने कहा है कि उसे केवाईसी समेत सभी नियमों का कड़ाई से पालन किया है। साथ ही पुरी की तरफ से संदिग्ध अनियमितता के बारे में तत्काल रिजर्व बैंक और अन्य एजेंसियों को सूचना दी।
सूत्रों का कहना है कि सिटी बैंक ने कुछ ग्राहकों से पुरी के बारे में मिली शिकायत के बाद रिजर्व बैंक को सूचना दी। शीर्ष बैंक 2009 से सिटी बैंक की गुड़गांव शाखा में खातों के जरिए हुए विभिन्न लेनदेन की जांच कर यह पता लगा रहा है क्या किसी में एसटीआर की जरूरत थी।
रिजर्व बैंक 2001 में केवाईसी नियम लागू किए थे। सबसे पहले इस नियम का पालन नहीं करने को लेकर 2004 में कथित तौर पर सिटी बैंक पर ही 5 लाख रुपए का जुर्माना लगाया गया था।
सिटी बैंक की गुड़गांव शाखा में 400 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी मामले में रिजर्व बैंक इस बात की जांच कर रहा है कि क्या इस संबंध में ग्राहकों की जांच और खातों पर नजर रखने के नियमों की अनदेखी हुई है।
सूत्रों के अनुसार शीर्ष बैंक की शुरूआती जांच में यह संकेत मिला है कि सिटी बैंक में लगभग एक दर्जन खातों के जरिए करोड़ों रुपये का लेनदेन हुआ। इन खातों को मुख्य आरोपी शिवराज पुरी द्वारा परिचालित किए जाने की आशंका है।
इनमें से कुछ खाते सिटी बैंक के उप ग्राहकों के थे जो धोखाधड़ी के शिकार हुए। जबकि कुछ खाते पुरी ने अपने संबंधित या काल्पनिक लोगों के नाम पर खोले थे।
रिजर्व बैंक इस बात का पता लगा रहा है कि क्या सिटी बैंक ने अपने ग्राहकों को जानें [केवाईसी] नियमों के पालन के बाद इन खातों को खोलने की अनुमति दी। इसके तहत ग्राहकों की जांच अनिर्वाय है। इसके लिए वैध पहचान पत्र और पैन कार्ड पासपोर्ट जैसे जरूरी कागजात के साथ घर के पते का प्रमाणपत्र शामिल हैं।
नियमों के तहत बैंकों के लिए यह भी अनिवार्य है कि वे ग्राहकों की भौतिक रूप से जांच करें।
सूत्रों के मुताबिक इसके अलावा, केंद्रीय बैंक इस बात का पता लगाने की भी कोशिश कर रहा है कि क्या सिटी बैंक ने संदिग्ध सौदा रिपोर्टिंग [एसटीआर] की जांच की थी। इसके तहत बैंक को अपने किसी भी खाते च्ें उच्च और असामान्य सौदों के बारे में नियामक और प्रवर्तन एजेंसियों को जानकारी देनी होती है।
धनाढ्य व्यक्तियों के खातों के मामले में बैंकों को केवाईसी और एसटीआर नियमों का कड़ाई से पालन अनिवार्य है। सिटी बैंक मामला धनाढ्य व्यक्तियों से ही जुड़ा है जो कथित तौर पर पुरी द्वारा धोखाधड़ी के शिकार हुए।
सिटी बैंक ने कहा है कि उसे केवाईसी समेत सभी नियमों का कड़ाई से पालन किया है। साथ ही पुरी की तरफ से संदिग्ध अनियमितता के बारे में तत्काल रिजर्व बैंक और अन्य एजेंसियों को सूचना दी।
सूत्रों का कहना है कि सिटी बैंक ने कुछ ग्राहकों से पुरी के बारे में मिली शिकायत के बाद रिजर्व बैंक को सूचना दी। शीर्ष बैंक 2009 से सिटी बैंक की गुड़गांव शाखा में खातों के जरिए हुए विभिन्न लेनदेन की जांच कर यह पता लगा रहा है क्या किसी में एसटीआर की जरूरत थी।
रिजर्व बैंक 2001 में केवाईसी नियम लागू किए थे। सबसे पहले इस नियम का पालन नहीं करने को लेकर 2004 में कथित तौर पर सिटी बैंक पर ही 5 लाख रुपए का जुर्माना लगाया गया था।
शनिवार, 15 जनवरी 2011
शाहरुख-सौरव विवाद के पीछे क्या है?
पिछले दिनों आई पी एल चतुर्थ के लिये खिलाडियों की हुई नीलामी में भारत के पूर्व कप्तान और कोलकाता नाइट राइडर्स के कप्तान सौरव गाँगुली की नीलामी न होने का विवाद अब राजनीतिक रंग लेता जा रहा है। कुछ दिन पूर्व पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने इसे सौरव गाँगुली का अपमान बताते हुए राजनीतिक साजिश बताया था तो वहीं मुम्बई से शिवसेना अध्यक्ष ने भी इसे प्रिंस ऑफ कोलकाता का अपमान बताते हुए शाहरुख खान को दोषी ठहराया था। अब पहली बार पश्चिम बंगाल की सरकार के एक मंत्री ने भी इस विषय पर अपनी राय रखी है।
शाहरुख खान और सौरव गाँगुली के बीच इस विवाद का कारण वास्तव में पश्चिम बंगाल ले प्रसिद्ध उद्योगपति और लक्स कोज़ी ब्रांड के स्वामी अशोक टोडी के साथ सौरव गाँगुली परिवार के अच्छे रिश्ते बताये जा रहे हैं जिनका परिवार भी बंगाल के अग्रणी उद्योग़पतियों में है।
कुछ वर्ष पूर्व जब अशोक टोडी की पुत्री प्रिया टोडी ने रिज़वान रहमान ने निकाह कर लिया था और उसके बाद संदिग्ध परिस्थितियों में रिज़वान की आत्महत्या के बाद रिज़वान के परिजनों ने अशोक टोडी पर रिज़वान को आत्मह्त्या के लिये उकसाने का आरोप लगाया था और उसकी जाँच भी चल रही है। इस पूरे विषय को पश्चिम बंगाल में राजनीतिक रंग दिया जा चुका है जिसमें अनेक सामाजिक संगठन अशोक टोडी के परिवार के विरुद्ध आरोप लगाकर न्याय की माँग कर रहे हैं। पिछले वर्ष शाहरुख खान और सौरव गाँगुली के मध्य उस समय मनमुटाव हो गया था जब अनेक मुस्लिम संगठनों और सामाजिक संगठ्नों के दबाव में आकर शाहरुख खान ने कोलकाता नाइट राइडर्स और लक्स कोजी के मध्य हुए प्रायोजक करार को बीच में ही तोड दिया था और प्रेस कांफ्रेंस कर बयान दिया था कि पश्चिम बंगाल के लोगों की भावनाओं को ध्यान मे रखते हुए इस विषय पर न्याय होना चाहिये । इस करार के टूटने से लक्स कोजी कम्पनी को काफी आर्थिक नुकसान हुआ था। सूत्रों के अनुसार इसके बाद शाहरुख खान को यह भी लगा कि पिछले वर्ष आई पी एल में कोलकाता के खराब प्रदर्शन में सौरव गाँगुली का सक्रिय हाथ रहा है।
ज्ञातव्य हो कि रिज़वान के साथ प्रिया के चले जाने के बाद सौरव गाँगुली के बडे भाई ने अशोक टोडी के परिजनों की ओर से मध्यस्थता करते हुए रिज़वान के परिजनों को इस बात के लिये मनाने का प्रयास भी किया था कि प्रिया अपने घर वापस लौट जाये । रिज़वान के पूरे मामले ने राजनीतिक रंग ले लिया है और बंगाल में चुनाव की आहट के साथ इस पूरे विवाद में शाहरुख खान और सौरव गाँगुली दो ध्रुवों पर खडे हैं। सूत्रों के अनुसार अत्यंत बारीकी से अपने विरोधियों को नीचा दिखाने में माहिर शाहरुख खान ने सौरव गाँगुली के साथ अपना हिसाब चुकता कर लिया है साथ ही शाहरुख खान कलाकार के साथ साथ आने वाले दिनों में देश की राजनीति में भी अपनी भूमिका देख रहे हैं और इसलिये अपने लोगों को अपनी तरह से संकेत दे रहे हैं।
शाहरुख खान और सौरव गाँगुली के बीच इस विवाद का कारण वास्तव में पश्चिम बंगाल ले प्रसिद्ध उद्योगपति और लक्स कोज़ी ब्रांड के स्वामी अशोक टोडी के साथ सौरव गाँगुली परिवार के अच्छे रिश्ते बताये जा रहे हैं जिनका परिवार भी बंगाल के अग्रणी उद्योग़पतियों में है।
कुछ वर्ष पूर्व जब अशोक टोडी की पुत्री प्रिया टोडी ने रिज़वान रहमान ने निकाह कर लिया था और उसके बाद संदिग्ध परिस्थितियों में रिज़वान की आत्महत्या के बाद रिज़वान के परिजनों ने अशोक टोडी पर रिज़वान को आत्मह्त्या के लिये उकसाने का आरोप लगाया था और उसकी जाँच भी चल रही है। इस पूरे विषय को पश्चिम बंगाल में राजनीतिक रंग दिया जा चुका है जिसमें अनेक सामाजिक संगठन अशोक टोडी के परिवार के विरुद्ध आरोप लगाकर न्याय की माँग कर रहे हैं। पिछले वर्ष शाहरुख खान और सौरव गाँगुली के मध्य उस समय मनमुटाव हो गया था जब अनेक मुस्लिम संगठनों और सामाजिक संगठ्नों के दबाव में आकर शाहरुख खान ने कोलकाता नाइट राइडर्स और लक्स कोजी के मध्य हुए प्रायोजक करार को बीच में ही तोड दिया था और प्रेस कांफ्रेंस कर बयान दिया था कि पश्चिम बंगाल के लोगों की भावनाओं को ध्यान मे रखते हुए इस विषय पर न्याय होना चाहिये । इस करार के टूटने से लक्स कोजी कम्पनी को काफी आर्थिक नुकसान हुआ था। सूत्रों के अनुसार इसके बाद शाहरुख खान को यह भी लगा कि पिछले वर्ष आई पी एल में कोलकाता के खराब प्रदर्शन में सौरव गाँगुली का सक्रिय हाथ रहा है।
ज्ञातव्य हो कि रिज़वान के साथ प्रिया के चले जाने के बाद सौरव गाँगुली के बडे भाई ने अशोक टोडी के परिजनों की ओर से मध्यस्थता करते हुए रिज़वान के परिजनों को इस बात के लिये मनाने का प्रयास भी किया था कि प्रिया अपने घर वापस लौट जाये । रिज़वान के पूरे मामले ने राजनीतिक रंग ले लिया है और बंगाल में चुनाव की आहट के साथ इस पूरे विवाद में शाहरुख खान और सौरव गाँगुली दो ध्रुवों पर खडे हैं। सूत्रों के अनुसार अत्यंत बारीकी से अपने विरोधियों को नीचा दिखाने में माहिर शाहरुख खान ने सौरव गाँगुली के साथ अपना हिसाब चुकता कर लिया है साथ ही शाहरुख खान कलाकार के साथ साथ आने वाले दिनों में देश की राजनीति में भी अपनी भूमिका देख रहे हैं और इसलिये अपने लोगों को अपनी तरह से संकेत दे रहे हैं।
सोमवार, 10 जनवरी 2011
राजनीती रंग में रंगता तिरंगा
" केसरिया बल भरने वाला
स्वेत रंग सच्चाई
हरा रंग है हरी हमारी
धरती की अंगड़ाई
और कहता है चक्र हमारा
कदम कभी न रुकेगा
हिंद देश का प्यारा झंडा
ऊँचा सदा रहेगा "
ये कविता हमारे पथ्य क्रम में हुआ करता था और हम इसे कंठस्त भी करते थे । यही कारन है की आज ये पंक्तियाँ हमारे रगों में लहू की तरह बहते haइन यही कारन भी रहा की आजाद भगत सरीखे देश भक्त यहीं जन्में ।
फिलवक्त की राजनीती के सामने ये पंक्तियाँ बौनी हो गये हैं । समकालीन दौर में देश की राजनीती ने तिरंगे का इस्तेमाल अपनी अपनी तरह से अपने सियासत की खोई जमीन को तलासने के रूप में किया है । सता पर काबिज लोगों ने अपनी सत्ता बरकरार रखने के लिए भी इश्क इस्तेमाल किया है । आज सियासत में भावनाओं का समवेस लेस मात्र भी नै रह गया है । अभी की बात करें तो कश्मीर मुद्दा इन सब के केंद्र में है । इस साल भाजपा ने स्वतंत्रता दिवस पर कश्मीर के लाल चोक पर झंडा फरने का ऐलान क्या किया की सब ने इया मुद्दे को अपने अपने रूप से राजनितिक रंग देने की कवायद सभी ने शुरू कर दी । कश्मीर से दिल्ही तक सभी इस्सकी दबी जुबान में भर्त्सना करने लगे ।
कांग्रेस के बोधिक लोगों ने इसके खिलाफ बेबाकी से बोला वो भी बोले जिनके मुह पर अमूमन समझा जाता है की कांग्रेसी जाब लगा है ।
बहरहाल यहाँ ये जानना दिलचस्प होगा की पिछले दिनों भारत की तथा कथित लेखिका अरुंधती राय ने भड़काऊ बयाँ दिया था तब कई दिनों तक कांग्रेस सिंह पुच नै दुलाई थी । मसलन विपक्ष ने हंगामा किया तब जाकर देश द्रोह का मामला दर्ज हुआ वो भी तिस हजारी कोर्ट के द्वारा ।
इस पर बात करते हुवे कांग्रेस के बुद्धिजीवी नेता ने ये कहा की अरुंधती पर कोई करवाई न होना भी एक करवाई है ।
अगर दोनु मुद्दों को देखा जाये तो दोनों कश्मीर से जुड़े हैं पर है एकदम भिन्न एक ने देश तोड़ने की कोशिश की वहीँ दूसरा जोड़ने की कोशिस कर रहा है । तब कांग्रेस अरुन्धतीं का समर्थन न सही विरोध भी नकिया । वहीँ भाजपा का खुल कर विरोध कर रही है । नेता ये सार्वजनिक तोर पर कह रहे हैं की अगर घटी में फिर हिंसा भड़की तो इसक जिम भाजपा पर होगा । कांग्रेस की क्या मंशिकता है वो इसी से समझी जा सकती है । भाजपा तो तिरंगा फहराकर ये अलख जगाना चाहती है ये बताना चाहती है की कश्मीर भारत का अभिन अंग है । इससे किसी भी हालत में नै छोड़ा जा सकता । भाजपा के इस कदम को सारी पार्टियाँ सराहती तो अच्छा होता ,जो कांग्रेस इसके खिलाफ है वो सायद भूल गई हैं की इस की पूरी पथ कथा नेहरु के नेतृत्व में लिखी गये थी ......................
स्वेत रंग सच्चाई
हरा रंग है हरी हमारी
धरती की अंगड़ाई
और कहता है चक्र हमारा
कदम कभी न रुकेगा
हिंद देश का प्यारा झंडा
ऊँचा सदा रहेगा "
ये कविता हमारे पथ्य क्रम में हुआ करता था और हम इसे कंठस्त भी करते थे । यही कारन है की आज ये पंक्तियाँ हमारे रगों में लहू की तरह बहते haइन यही कारन भी रहा की आजाद भगत सरीखे देश भक्त यहीं जन्में ।
फिलवक्त की राजनीती के सामने ये पंक्तियाँ बौनी हो गये हैं । समकालीन दौर में देश की राजनीती ने तिरंगे का इस्तेमाल अपनी अपनी तरह से अपने सियासत की खोई जमीन को तलासने के रूप में किया है । सता पर काबिज लोगों ने अपनी सत्ता बरकरार रखने के लिए भी इश्क इस्तेमाल किया है । आज सियासत में भावनाओं का समवेस लेस मात्र भी नै रह गया है । अभी की बात करें तो कश्मीर मुद्दा इन सब के केंद्र में है । इस साल भाजपा ने स्वतंत्रता दिवस पर कश्मीर के लाल चोक पर झंडा फरने का ऐलान क्या किया की सब ने इया मुद्दे को अपने अपने रूप से राजनितिक रंग देने की कवायद सभी ने शुरू कर दी । कश्मीर से दिल्ही तक सभी इस्सकी दबी जुबान में भर्त्सना करने लगे ।
कांग्रेस के बोधिक लोगों ने इसके खिलाफ बेबाकी से बोला वो भी बोले जिनके मुह पर अमूमन समझा जाता है की कांग्रेसी जाब लगा है ।
बहरहाल यहाँ ये जानना दिलचस्प होगा की पिछले दिनों भारत की तथा कथित लेखिका अरुंधती राय ने भड़काऊ बयाँ दिया था तब कई दिनों तक कांग्रेस सिंह पुच नै दुलाई थी । मसलन विपक्ष ने हंगामा किया तब जाकर देश द्रोह का मामला दर्ज हुआ वो भी तिस हजारी कोर्ट के द्वारा ।
इस पर बात करते हुवे कांग्रेस के बुद्धिजीवी नेता ने ये कहा की अरुंधती पर कोई करवाई न होना भी एक करवाई है ।
अगर दोनु मुद्दों को देखा जाये तो दोनों कश्मीर से जुड़े हैं पर है एकदम भिन्न एक ने देश तोड़ने की कोशिश की वहीँ दूसरा जोड़ने की कोशिस कर रहा है । तब कांग्रेस अरुन्धतीं का समर्थन न सही विरोध भी नकिया । वहीँ भाजपा का खुल कर विरोध कर रही है । नेता ये सार्वजनिक तोर पर कह रहे हैं की अगर घटी में फिर हिंसा भड़की तो इसक जिम भाजपा पर होगा । कांग्रेस की क्या मंशिकता है वो इसी से समझी जा सकती है । भाजपा तो तिरंगा फहराकर ये अलख जगाना चाहती है ये बताना चाहती है की कश्मीर भारत का अभिन अंग है । इससे किसी भी हालत में नै छोड़ा जा सकता । भाजपा के इस कदम को सारी पार्टियाँ सराहती तो अच्छा होता ,जो कांग्रेस इसके खिलाफ है वो सायद भूल गई हैं की इस की पूरी पथ कथा नेहरु के नेतृत्व में लिखी गये थी ......................
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