भारत में राम मंदिर का मुद्दा एक बार फिर से नया भूगोल गढ़ रहा है . तथाकथित सेकुलर लोग लामबंद हो रहे है . एक प्रायोजित कार्यक्रम शुरू हो गया है . सिंघल जी के स्राधांजलि के बहाने भाजपा व संघ के मुह पर से दसको से बंधी जाब अचानक से खुल गयी है . ये मुखर होकर बोल रहे हैं . जिस हिंदुत्वा की खाल ओढ़ कर वोटों का द्रुविकरण किया था आज वह रंगा सियार साबित हो रहे हैं . अगर वोट और बहुमत की ही बात थी तो अब तक राम मंदिर की ईमारत बुलंद हो जानी चाहिए थी . लेकिन जिस तरह से स्राधांजलि के नाम पर भाजपा राम मंदिर को हवा दे रही है ये मात्र एक राजनीति का छिनरझप है .यकीन मानिये कुछ दिनों बाद धीरे से ये ब्यानबीर ही इस मुद्दे को ठंढे बसते में डाल देंगे और हम - आप अपनी संवेदना के साथ वही ढीठके खड़े रहेंगे . हम सब को अपनी भावनाओ को लगाम से कस कर ठन्डे दिमाग से ये सोचना चाहिए की जिस देश की मिट्टी खुद राम लला के पैदा होने का उत्सव मानती हो . जहाँ मिट्टी राम लला के तन ले लिपटने पर इतराती हो वहां हिंदुत्वा का बोलबाला होना चाहिए वहा हिंदुत्व अपने खेवनहार का बाट जोहेगी ? इस देश में इस बहस पे तत्काल पूर्णविराम लगे की राम मंदिर बनेगा या नही मसलन बहस ये हो की राम मंदिर भारत में क्यों नही बनेगा . जिस भारत में मर्यादा पुर्सोतम श्री राम ने जन्म लिया उस देश में भगवत आस्था पर प्रश्न उठाना ही जाहिलियत है . इस देश की राजनीति अगर शतरंज के घोड़े जैसा ढाई घर चलना बंद कर दे उस दिन हिन्दुस्तान को अखंड भारत होने से कोई नही रोक सकता . सत्ता का चरित्र होता है की या तो वो निरंकुश बनती है या बेहंगा . ये बिम्ब निरंकुश होने के नही .