गुरुवार, 30 दिसंबर 2010

उमा पर ब्रेक .......कब तक

सत्ता में चाटुकारों की तूती हमेसा बोलती है । पार्टियाँ कोई भी हो चाटुकार अपने रशुक से काम ही लेते हैं । कभी कभी महिमा मंडित कर उसके पथ भ्रस्त होने तक की मिस्साल गढ़ते हैं । इतिहास के पन्ने पलटने पर वह जगमगा उठें गे
भाजपा भी चाटुकारों से पटी पड़ी है ऐसा तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष भी मानते हैं । उन्होंने अध्यक्ष की कुर्सी सँभालने समय संबोधन में कहा था कि पार्टी को चाटुकारों से दुरी और जमीनी नेताओं से सरोकार बढ़ाना होगा ,तभी काया पलट हो सकती है । ये बातें सायद जमीनी नहीं हो सकी । वर्षों से कयास लगाया जा रहा था कि उमा भारती देर सबेर भाजपा में लौटेंगी पर इन सरे कयासों को उन्होंने सिरे से ख़ारिज कर दिया । पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि अभी कीसी राजनीती पार्टी को सहयोग देने का सवाल ही नही उठता । ससरी पार्टियाँ भारस्ताचार में आकंठ डूबी है। यह बयाँ जिस कीसी परिस्थिति में आये हों पर अभी वापसी पर ब्रेक लगा है । अगर लोगों कि मने तोसब्की किस्मत जसवंत सिंह जैसी नही होती , उनकी एक अलग लोबी है ,जो उनकी वापसी को लेकर संघ तक के मुह पर तमाचा जड़ने में पीछे नै रहा । उमा भले ही आम लोगों कि प्रिय नेता हो उनके दिलों पर राज करती हों पर वो भाजपा में अपने लिए लाबी तयार करने और अपने संघ समर्तकों में जन फुकने में फिसड्डी साबित हुई हैं ।
गौरतलब है कि कांग्रेस पर हमेसा से समय कि राजनीती करने का कलंक लगता रहा है । परन्तु आज भाजपा के कद्दावर नेता भी इस दायरों में आने लगे हैं ,वरना क्या कारन है कि परमोद महाजन ,कप्तान सिंह सोलंकी, शिवराज सिंह चोहान कि बिसात पर उमा को बहार का रास्ता दिखा दिया गया । इस तरह के इल्जाम नरेन्द्र मोदी पर भी लगते रहे हैं कि वो लोगों को सियासत में कंडोम सा इस्तेमाल करते हैं ,और उसे सही समय पर सही ठिकाने भी लगा देते हैं । बहरहाल भाजपा एक विचार वादी संगटन है । सो बेहतर होगा कि एक विचार हो बेहतरी के लिए । ताकि आने वाला समय प्रत्य्कुल साबित हो भाजपा के लिए और भाजपाइयों के लिए .......... ।

बुधवार, 29 दिसंबर 2010

मृतप्राय होती लोकतंत्र

दुशासन हर युग में जन्म लेते हैं परन्तु हर दुसासन अपना कम हर युग में अलग तरह से करता है । महाभारत में एक दुसासन था जो सीता माता को भरी सभा में चिर हरण की कोशिस की और आज तो न जाने कितने ही दुसासन हैं जो लोक तंत्र का चिर हरण करना चाहते हैं ।
अभी झारखण्ड में पंचायत चुनाव संपन हुआ हैं । आज कल में परिणाम भी आ जाये परन्तु जी तरह से आज के दशासन लोक तंत्र से खेल रहें हैं वो आने वाले खतरे की ओर इशारा कर रहा है । पंचायत चुनाव के दौरान छतरपुर प्रखंड के अंतर गत चल रहे पंचायत चुनाव के परचार के दौरान एक प्रत्याशी लोगों को अपने छेत्र में हर एक वोटर को पाच सो रुपया ओर एक मुर्गा ओर एक बोतल अंग्रेजी शराब भी दे रहा था , हास्यास्पद तो यह हुआ की वो लोगों को गाँव की देवी के प्रांगन में सपथ दिलाई थी ,वोट मुझे ही देना ।
आज जिस तरह से चुनाव आयोग के खिची मर्यादित रेखा को पर कर पैसों के बल पर वोट लेने की कोशिस की जा रही है वो चुनाव आयोग ओर उसके मापदंडों को मुह चिढ़ा रहा है । सुनने देखने में लगता है की क्या को आज के जमाने में भी लोक तंत्र को अपनी जागीर समझता है ? क्या कोई दुशासन बुधिजीविओं के समाज में लोक तंत्र को नंगा नचाने की कोशिस कर सकता है । इस चुनाव के बाद कहीं ख़ुशी है तो कहीं गम है । खिसी कुछ उन लोगों की जो सचे मायनो में लोकतंत्र चाहते हैं जो गाँधी नेहरु का सपना , जो गाँव में बस्ता है ,उसे जीते हैं । नाराज यहाँ के नौकर शाही हैं । जिनके हाँथ से अब सारी शक्ति हस्तांतरित हो जाएगी , जिन नौकरशाहों की कभी चकलास थी अब मायूसी छाए है ।
इन सब के बिच कल परिणाम आने वाला है कई दिग्गजों की किस्मत इ वी म में बंद है । अब परिणाम जो भी हो लोग अपना दिल थामे बीते हैं ।
अगर लोकतंत्र के हत्यारे जीतते हैं तो लोक तंत्र मृतप्राय हो जाएगी ,ओर अगर सच में मह्त्वाकांची लोग जीतते हैं तो ये लोक तंत्र की बड़ी जित होगी साथ ही साथ लोक तंत्र के सरीर में एक न्य रक्त का संचरण होगा ।
अब परिणाम ही बतायेगा की लोकतंत्र किस रूप में परिणत होगा ................

गुरुवार, 23 दिसंबर 2010

आओ भारस्ताचार भारस्ताचार खेलें

आजादी के शिलान्यास के बाद गाँधी जी ने नेहरु से कहा था कि अब समय आगया है जब कांग्रेस को ख़त्म कर देना चाहिए । हमने अपना लक्ष्य प् ही लिया है । इस बात पर नेहरु तैयार नई हुए । सवाल यह उठता है कि क्या उन्हें सत्ता के नशा का अंदाजा था ।
बहरहाल हालत जो भी हो परन्तु एक बात तो तय है कि नेहरु के बागडोर सँभालते वो तमाम चीजें पार्टी में घर करने लगी । मसलन वो आज नासूर बन कर उभर रही हैं , चाहे वो कश्मीर हो या चीन
गौरतलब है कि जिन विचारधाराओं के साथ कांग्रेस का गठन हुआ था आज उसे हासिये पर धकेल दिया गया है आज कई घोटालों में उसकी संलिप्तता देखि जा सकती है । नेताओं कि मंशिकता इसी बात से समझी जा सकती है कि पार्टी के एक नेता घोटाले में फसते हैं और जब उनसे इस्तीफा माँगा जाता है तो वो कहते हैं कि जन दे दूंगा पर इस्तीफा नही दूंगा । तो यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि ये राजनीती में घोटालों के लिए ही आते हैं वो भी आणता सतु बांध के ।
इन्ही सब के बिच दिल्ली में कांग्रेस का १२५ वें वर्ष गांठ मना । यह महाधिवेसन किस मुद्दे पर था ये साफ नही हो सका। क्या जिस तरह से बिहार के जनता पर युवराज का कोई जड़ो नही चला उस पर या या जिस तरह कांग्रेस बिहार में रसातल में चली गये उसपर । यह अपने हर कि समीक्षा थी या आगामी चुनाव कि मद्देनजर कार्यकर्ताओं में जान फिकने कि कवायद । स्समझ से प्रे है बेहतर होगा आप खुद इसे जिस परिपेक्ष में चाहे ढल लें ।
पर एक बात तो तय है कि कांग्रेस को आत्मचिंतन कि जरूरत है । आज इस २१ शताब्दी में भी जाट पट और संप्रदाय कि राजनीती करती है । अच होता बिहार चुनाव के नतीजे और तात्कालिक अयोध्या मामले पर नजर डोडा लेटी अगर इससे कोई सबक ली होती तो सायद इस ओंची राजनीती से बज आ जाते ।
ये भुत ही दुःख कि बात है कि कि १२५ वर्ष गांठ पर उपलब्धियां नही गिनाये जा रहे , अस्पस्तीकरण दिया जा रहा है । फिलवक्त को देख के लगता है कि कांग्रेस को भाजपा फोबिया हो गया है । आज जिसे कांग्रेस प्रधान मंत्री के रूप में लोगों के सामने पेश कर रही है वो वक्त्य्गत रूप से भी जाती और संप्रदाय कि राजनीती में विस्वास रखता है । उन्हें मन कि राजनीती में आए ज्यदीन नही हुए ये देश के कद्दावर नेता भी मन चुके हैं तो क्यूँ न पार्टी ही उन्हें कुछ सिखा पढ़ा दे । ये दोनों के सेहद के लिए अच रहेगा । कम से कम वोट के लिए तो देश को न बातें
रंगीन दुनिया में बदरंग जिन्दगी जीते रहे
हमारे हाँथ में खली प्यालें हैं
जिन्होंने बक्शा नहीं अपने जमीर को
आज ऐसे हमारे वतन के रख्वालें हैं

बुधवार, 22 दिसंबर 2010

वो मंजिल पर पहुचे तो मंजिल बड़ा दी

हम भारतीय होने के नाते भारतीय संस्कृति को जीते हैं ,बल्कि संस्कृति हमारे रगों में लहू की तरह दौड़ता है । गीता जो हमारे संस्कृति का एक अनमोल रत्ना है हमारा धर्म ग्रन्थ है जिसमे श्री कृष्ण ने कहा है की'' कर्म करो फल की चिंता मत करो ''। आज इसकी जीती जगती प्रतिमुर्ती हमारे समाज में मोजूद है जो विश्व स्तर पर एक रिकॉर्ड बना कर कहता है की मेरे लिए ये महज एक अंक है । यह शालीनता , सौम्यता ही उसे महानतम क्रिकेटर के रूप में पदस्त करती है । जी मैं बात कर रहा हुईं सचिन रमेश तेंदुलकर की ।
इन्होने जिस तरह से हर पडाव को पर किया है वो सराहनीय है और जिस तरह से कीर्तीमान गद रहे हिन् वो अद्भुत है । जब गावस्कर के शतक को चुना भी नामुमकिन समझा जाता था तब ये सितारा क्रिकेट की दुनिया मैं धूमकेतु की तरह आया और और इस खेल की पराकास्ठा पर पहुच गया ।
आज पूरी दुनिया मैं सचिन के शान मैं कसीदे पढ़े जा रहे हैं वहीँ हमें भी भारतीय बताते हुई दुनिया के शीशे मैं नुमैस करना अच लग रहा है । क्रिकेट के नवोदित खिलाडियों के लिए यह मुकाम पाना सपने जैसा होगा । सचिन के पीछे दो खिलाडी हैं जो इस लक्ष्य का पिचा कर रहे हैं पहले पोंटिंग दुसरे कैलिस । बहरहाल कुछ बैटन की सचाई समय की कसौटी पर तय होते हैं ।
आज ब्राडमैन के देश तक सचिन की गूंज सुनाई दे रही है । सचिन को क्रिकेट के कद्दावर खिलाडी ब्राडमैन से बेहतर मानते हैं ।
आज इस बात की चर्चा जो पकड़ने लगी है की भारत के इस सपूत को भारत रत्ना मिलना चाहिए । देश की रस्त्रुया पार्टियाँ भी इस बात से इतफाक रखते हैं । खैर आज सारा भारत खुस है । सचिन ने क्रिसमस के मौके पर शांता बन कर शतक की अर्धशतकीय पारी उपहार मैं दी है । आज सारा भारत सचिनमय हो गया है ।'' आने वाली पीढियां रस्क करेंगी कि हमने सचिन को खेलते देखा है ''

सोमवार, 13 दिसंबर 2010

२ जी .....सोनिया जी राहुल जी

आखिर जे पी सी क्या है ,यह जानना जरूरी है । जे पी सी कोई जाँच अजेंसी या कमेटी नहीं होती । बाकि संसदिये समितेयों की तरह जे पी जी भी सभी दलों के सदस्यों की तरह एक संसदिये कमिटी है जो विशेष मुद्दों की जाँच करती है । कोई इस ग़लतफ़हमी में न रहे की जे पी सी बन्ने से निस्कर्स आ जायेगा अतीत में भी जे पी सी का गठन हो चूका है वो मुद्दे खान गये किसी को पता नही । सरकार को इससे जय आराम रहता की जे पी सी बनाकर पूरे मामले को ठन्डे बसते में डाल देती । सालों साल जे पी सी चलेगी मुद्दे दब जाएँगे ।

ये उक्त बातें कही हैं कांग्रेस के प्रवक्ता राजीव शुक्ला ने । बहरहाल जब कांग्रेस और शुक्ला ये जानते हैं तो पार्टी ये बालहठ छोड़ क्यूँ नहीं देती ? जे पी सी पर तयार क्यूँ नै हो जाती

गोरतलब है की सुब्रमण्यम स्वामी जो साऊथ में जनता पार्टी के तत्कालीन अद्यक्ष हैं कानून मंत्री भी रह चुके हैं कहा की अवसर की राजनीती करने वाली कोंग्रेस इस पूरे प्रकरण में बुरे तरह से फँस रही है । यह पूरे गाँधी नेहरु परिवार के अस्मिता का सवाल है अगर ये सिर्फ मनमोहन शिंह की अकर्मण्यता होते तो कांग्रेस कब की तयार हो जाती । सुब्रमन्यम स्वामी ने बताया की ४० हजार करोड़ जो देश के जनता के पैसे हैं सोनिया के बहन को पहुचाया गया है । यह कांग्रेस के लिए गले की फाँस बनता जा रहा है । मसलन कांग्रेस घबरा रही है ।

अगर राजीव शुक्ला की बात करें तो कुछ सालों पहले वो मिडिया में अच्छा दखल रखते थे । एक सशक्त पत्रकार रह चुकें है पर ये जो बयाँ आया है जनता उसे कता समझे एक राज नेता का ब्यान या एक पत्रकार के कलम की स्याही ।

खैर अगर फिलवक्त पत्रकारिता की बात करें तो वो भी दो खेमो में बात गयी है पहला मिडिया दूसरा रादिया । इनका यह बयाँ तो इनको पत्रकारिता के दुसरे खेमे में कतारबद्ध खाड़ी करती है ।

और अगर देश की एक जिमेद्दर रास्ट्रीय पार्टी का प्रवक्ता इस तरह का बयाँ देता है और देश का पैसा जो जनता का है इस तरह लुटाया जाता है तो यह दुर्भाग्य पूर्ण है । इन करतूतों से झलकता है की विचारधारा क्या है । आम लोगों की पार्टी के रूप में चाप छोड़ने वली कांग्रेस किन लोगों की हिमायती है इसकी कलाई बखूबी खोलती है २ जी स्पेक्ट्रम । इसकी जे पी सी जाँच होनी ही चाहिए । अगर ऐसा नहीं होता तो आम आदमी का भरोसा न्याय पालिका से उठ जायेगा ।

बुधवार, 1 दिसंबर 2010

शिक्षा की पृष्ठ भूमि रहा है बिहार

बिहार हमेसा से करिश्मा का उत्क्रिस्ट उदाहरण रहा है । इस बार के चुनाव ने लोगों के के यादों को कुरेद कर हरा कर दिया है । पुरे देश को यह बता भी दिया है की जब जब देश की राजनीति और राजनीतिज्ञ अपने पथ से विमूढ़ होंगे तब तब बिहार एक आदर्श के रूप में लोगों के समक्ष आएगा । इस कड़ी में जे पी आन्दोलन और गाँधी का स्वतंत्रता आन्दोलन सरीखे देखा जा सकता है ।१९७७ में जो चिंगारी जे पी ने बिहार से फूंकी थी वो आग सरीखे डेलही पहुची और उस समय तात्कालिक प्रधानमंत्री को राजगद्दी छोडनी पड़ी । तब आम खास सब की जबान पर जे पी थे , जिन्होंने सत्ता के गलियारों से होकर भाते तानाशाही बयार के रुख को बदल कर नयी दिसा दी थी । एक तब का दिन था और एक आज का दिन है जब कांग्रेस तिलमिला उठी है , जैसे उसकी छाती पर किसी ने अजगर रख दिया हो बहरहाल जिस तरह से नितीश ने कांग्रेस का जनाधार निगल लिया है वो अजगर नही कोई नितीश जैसा आनाकोंडा ही कर सकता । आज आलम यह है की बिहार में विपक्ष की भूमिका के लिए कोई नै बचा । किसी ने अंदाज भी नै लगाया था की इस तरह का जनाधार होगा । आज बिहार की जनता ने ये इस्सर कर दिया है की वह मसखरी नही चाहता वह किसी युवा नेता का दुवा और भाषण नहीं चाहता वह चाहता है की नए बिहार का आगाज हो । वह चाहता है की जिस शिद्दत के साथ नितीश एस इबारत को लिखना शुरू किया है उसी शिद्हत से इसे अंजाम भी दें । नितीश ने इस ऐतिहासिक जित के बाद कहा था की आज हम सभी को जाति छोड़ हमे बिहारी होने का परिचय देना होगा तब सायद हम पुरे देश की सियाशत को नई दिसा दे सकते हैं ।

मंगलवार, 30 नवंबर 2010

कांग्रेस की नगरी को चहुपट करता राजा


आ देखते देखते कांग्रेस राजनीति में अछूत हो गयी है । लोग उससे कन्नी काटते देख रहे हैं । आज हर कोई कांग्रेस को भारस्ताचार को पोसक मानता है चाहे वह राजा का मामला हो या कोड़ा का । ऐसा मन जा रहा है की दोनों ने कांग्रेस के इशारे पर जनता के पैसों को बपौती धन समझा । ये नाकारा नही जा सकता की कांग्रेस का इतिहास घोटालों से जुड़ा रहा है। पर दर है खिन इस बार राजा का यह घोटाला कांग्रेस को रंक न बना दे । नाम के विपरीत कम करने वाले इस संचार मंत्री ने कांग्रेस को कही नक् रखने लायक नै छोड़ा ।
अभी इन सब से वो उबार भी नै पाई थी की जगमोहन रेड्डी ने अपना इस्तीफा सौंप कर कांग्रेस की अंदर में जमीन हिला दी । पार्टी का कहना है की इससे कोई व्यापक असर नै पड़ेगा । बहरहाल कांग्रेस को यह बात भूलनी नै चाहिए की जगमोहन के पिता के असमय मौत पर जनता की जो शानुबुती थी उससे जगमोहन ने राजनीति की पूंजी के रूप में संचित किया है । या यूँ कहें की उन्होंने जनता की नब्ज बिना छुए पहचान ली
जगमोहन के बागी तेवर से ये साफ़ जाहिर है की वो जनता के बेहद करीब हैं अगर उन्हें मुक्यमंत्री नहीं बनाया गया तो वो कांग्रेस का जीना मोहल कर देंगें । यह सपना उन्होंने तब से बुन रखा है जब उनके पिता की असमय मिरितु हुई थी । तब जनता और खुद जगमोहन को ऐसा लगा था की अगला मुक्यमंत्री वो खुद होंगे पर ऐसा सायद इस लिए भी नै हुआ की यह गाँधी नेहरु का विसेसधिकार है । हो सकता है वो इस बार न बन पायें लेकिन आने वाले समय में वो कांग्रेस का समीकरण जरुर बिगड़ देंगें । वो अपने चैनल पर खुल कर राहुल गाँधी की आलोचना करते हैं । जगमोहन ही ऐसे युवा नेता हैं जो राहुल को चलेंजे कर सकते हैं जिसके पास व्यापक जनाधार है । उनको यह सुविधा अपने पिता से विरासत में मिली है । इसको कांग्रेस भी भली भीती जानती है सो फिलहाल छुपी साधे है

बुधवार, 3 नवंबर 2010

तारनहार तलाशती भाजपा

भाजपा ने कई उतार चढ़ाव देखे हैं .जब १९८४ में भाजपा दो शीटों के साथ संषद में पहुंची थी तब कांग्रेस नेता राजीव गाँधी ने कहा था की हिंदुत्वा की विचारधारा मर चुकी है और उसकी आरती को कंदा देने वाले चार सदस्य भी लोक सभा नहीं पहुंच सके .इसके ठीक १९८९ के चुनाव में छियासी संसद जित कर आए .समय के साथ बदलते परिवेश में भाजपा ब ढली है .इसके खद्दर धारी यह बखूबी जानते हैं की कब हिंदुत्व को नया रंग देना है या राम मंदिर को तूल। हर बार भाजपा का तीर निशाने पर लगता है । जो भी भाजपा को हमेसा एक सशक्त विकल्प के रूप में देखा जाता रहा है।
जब तिन दसक पहले अटल जी के नेतृत्व में ये पार्टी बनी थी तो उन्हीने संबोधन में भाजपा को ''अलग तरह की पार्टी ''कहा था .उन्होंने जोर देकर कहा था भाजपा कांग्रेस जैसी पार्टी नै है जो काले धन्देबजों तस्करों और अस्माजी तत्वों की सर्नस्थलीहै .यह विडंबना है की नहीं आज अटल जी हैं और नाही और नहीं उनके वो आदर्श ।
भाजपा आज अपने मूल विचारों को जैसे हासिये पर धकेल चुकी है .बस बची है तो शततानाशिनता ।satta की ऐसी बाजीगरी इससे पहले नही dekhee gye होगी
दम तोडती भाजपा में संघ ने जन फुकने की कवायद जरुर की परतु परिणाम वो नही आये जिसके कयास लगाये जा रहे थे .संघ ने अपने चहेते नितिन को भाजपा के सरपर थोप दिया .संघ के इस फैसले से भाजपा के अन्दर बाहर खासी नाराजगी देखी गयी .बात यहीं आकर नहीं रुकी भाजपा कई कुनबों में बात गया एक का आडवानी नेतृत्वा करते हैं तो एक का राजनाथ और तीसरे गडकरी हैं ही ।
अगर लोगों की मने तो अभी हाल में झारखण्ड में बनी सरकार को लेकर एक दफा अडवानी सुषमा जेटली जैसे कद्दावर नेतावों से पूछना भी मुनासिब नै समझा । यह भी आपसी मतभेद के कारन हुआ गडकरी को मुंडा पसंद थे वहीँ आडवानी को जसवंत भा रहे थे .आपसी मतभेद ही था की सपथ ग्रहण समारोह में आडवानी सुषमा सरीखे नेताओं ने सिरकत नही की
इस सरकार को बनाने में भले ही गडकरी को एड़ी छोटी का जोर लगाना पड़ा हो पर इस बार भाजपा की किरकिरी भी खूब हुई भाजपा पर विधायकों के खरीद प्रोख्त का भी इल्जाम लगा .सरकार तो बन गये लेकेन इश्क दूरगामी परिणाम गडकरी देखना नही चाहते या यूँ कहें अंजन बने हैं ।इसका फायदा झामुमो को हो जाये क्यूँ की उसका सारा भोतरआदिवासी है जिसे वो बरगला लेगा परन्तु भाजपा का वोटर शहरी और बुद्धिजीवी वर्ग है जो इसमें में मीन मेख निकले गा ही । आखिरकार नुक्सान भाजपा को होगा ।
आज भाजपा बस कुर्सी पैसों की राजनीती करती है । हल में विपक्ष की नेता सुषमा बेल्लारी में उन रेड्डी बन्दुओं को आशीर्वाद देती नजर आई जिनके भ्रस्ताचार को लेकर कर्णाटक के लोकायुक्त संतोष को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा था। सब जानते है की रेड्डी बंधू कर्णाटक के खनन माफिया है फिर भी सुषमा उनका बचाव कर रही है। संसद मई सवाल पूछने के पैसे लेने के कारन भाजपा के सांसद अपनी सदस्यता गवां चुके हैं
आज भाजपा सायद अपने बुरऐ दिन से गुजर रही है । आज भाजपा चर्चा में आती है तो अपने बदजुबानी की वजह से फी वो चाहे वरुण हों या फी खु गडकरी । ऐसा कहते हैं की कोई मुसीबत में होता है तो उसमे खुद उस मुसीबत से लड़ने की शक्ति इजाद हो जाती है । पर ऐसा कहने को होता ये लगता है भाजपा की फिलवक्त स्थिती को देख कर।

बुधवार, 27 अक्टूबर 2010

कब बहुरेंगे दिन

बिरसा मुंडा झारखण्ड में भगवन माने जाते हैं .वहां की जमीन आज भी पाक मानी जाती है .वह बस इसलिए की उन्होंने जनहित और राजहित के लिए लड़ते हुए अपनी जन दी .उन्होंने वहां की सरजमी को खून से शिचा आज भी वहां की भूमि पाक है । बिरसा ने लोगों का नेतृत्व करते हुए नेता के रूप में नई इबारत लिखी .मरणोपरांत उनकी क़ुरबानी और उनके त्याग ने उन्हें भगवन के समानांतर बैठा दिया .लेकेन एक सवाल जो वो छोड़ गये की क्या उनके सपने में रचा बसा राज्य ऐसा होगा ? झारखण्ड का गठन इस विस्वास के साथ हुआ था कि वहां कि सरकार इसकी सांस्कृतिक पहचान और जनजातिय हितों कि रक्षा करेगी .परन्तु ऐसा कुछ नई हुआ मसलन आज झारखण्ड कि राजनीति अस्थिरता को देख कर राज्य के गठन पर सवालिया निसान लगने लगे हैं .लगभग दस वर्सो में बतौर आठवे मुख्यमंत्री कि सपथ लेने वाले मुंडा तीसरी बार सत्ता पर काबिज हैं .यहाँ मुंडा, कोड़ा सरीखे सरे मुख्यमंत्री आदिबासी ही रहे अलबता उनके जीवन में कोई परिवर्तन नई हुआ । वही धक् के तिन पात। इसपर कोई बात करना नही चाहता चाहे वो सत्ता नसीन लोग हों या तताकथित बुद्धिजीवी सब कि जबान को लकवा मर जाता है । खैर अब कुछ माह के उठा पटक के बाद वहां फिर सरकार बनी है .आब देखना दिलचस्प होगा कि बैसखिओं के बल चलने वाली सरकार इस बार कितने चौकड़ी भरती है .फिलवक्त कि राजनीती भाजपा और विशेष रूप से गडकरी अर्जुन पर ही विस्वास दिखाया है .लाख काकः के बाद मुंडा वहां तक पहुचे हैं .अर्जुन मुंडा कि पृष्ठभूमि किसानो कि रही है और वो राजनीती में मझे बहरहाल वो जानते हैं कि सियाशत के किस मेध पर कितनी मिटटी चढ़ानी है .सरकार भले ही विस्वास मत हासिल कर ली हो पर अब विभागों के बटवारे पर कपर फुतौएल अभी बाकि है .रोज मुख्यमंत्री आवास के चखर लगाये जा रहे हैं । सरे नेता लबलबाए हुआ हैं । सूबे में परेशानिया कम होने का नाम नई ले रही भारस्ताचार ,नक्सलवाद और कई सवाल मुह बाये खड़े हैं .सबसे बड़ी चुनौती तो पंचायती है .शिबू शर्कर ने वडा तो किया पर सरकार गिर गये थी .यहाँ अब जनता सती सरकार कहती है यह विडंबना ही है कि प्राकृतिक रूप से धनाड्य राज्य कि जनता और जनतंत्र अपने दिन बहुरने कि रह देख रही है और जो तारणहार हैं वो अपनी बपौती समझ कर सारा राज्य कि सम्पति बेचने पर आमादा हैं .कुछ दिनों पहले जब सरकार गिरी थी तो फिर साकार बनने कि उमीद नई थी परन्तु जिस तरह से बाघ के बच्चे के मुह एक बार खून लग जाए तो वो हमेसा खोजता है और झारखण्ड के विधायकों के मुह पैसा लग गया है .जो थूकम फिजिहत भाजपा कि हुई उसकी सायद भरपाए अब कम से ही हो .अब राज्य को नेता बकाये भाजपा को तो सायद राम बचा ही लेंगे .