रविवार, 4 दिसंबर 2011

राजनीति का तिरया चरित्र

भारत आयोगों और योजनाओं का देश है । मसलन एक योजना १९७३- ७४ में भी बनी । हर पाच साल के बाद बताया जाता है की देश में गरीबी घाट रही है । पिछले साल बतया गया की भारत में गरीबों की संख्या घाट रही है यह छप्पन प्रतिसत से घट कर छबीस प्रतिशत रह गये है । योजना आयोग की यह दलील सुप्रीम कोर्ट को नागवार गुजरी उसने हस्तछेप करते हुए तलब किया । तब कहीं जाकर उसके सुर बदले और आंकड़ा फिर इकतालीस से छप्पन के बिच झूलने लगा ।
दूसरा आंकड़ों की जादूगरी देखिये हर साल सरकार कहती है हम किसानों का कड़ोरों का बैंक ऋण माफ़ कर रहे हैं । यह महज फ़साना ही है इसका पता तब चलता है जब १९९८ से अब तक का रिकॉर्ड देखें । इस सोलह साल में ढाई लाख किसानो ने आत्महत्या की । यहाँ ये सवाल मौजूं है की ये कड़ोरों रूपये जाते कहां हैं । जब इसके जड़ों को खोदें तब पता चलता है की इस पैसे की बन्दर बाँट सियासी रसूख दर करते हैं या सत्ता के चाटुकार । यह सभी को पता है की किसान को कभी बैंकों से लोने मिलता ही नही । यह मुनादी बस अपने पोलिटिक्स मयलेज़ के लिए होता है ।
आज दंभ भरा जाता है की हम विश्व के दुसरे सबसे तेजी से उभरते हुये अर्थव्यवथा वाले देश हैं। एक भारतीय होने के नाते सब को गरवान्वित होना चाहिए । परन्तु कहीं पढ़ा की जी ड़ी पी रेट गिर कर तक़रीबन साडे छह होगया है । ये जो दावे हैं मुझे समझ नही आते क्यूँ की मुझे पता ही नही चलता की जो कुछ हो रहा है जिस तरह के दावे किये जा रहे हैं वह आंकड़ों की बाजीगरी है या फिर राजनीति का तिरया चरित्र । जो लोगों को अमूमन समझ ही नही आता । इसके बावजूद नारा दिया जाता है'' हो रहा भारत निर्माण ''। आम जनता पूछना चाहती है की भारत निर्माण कहां हो रहा है आज भी गरीबी का आंकड़ा कम नही हुआ , हांथों को काम नहीं है। हाँ भारत निर्माण तो हुआ है स्विस बैंक में ,भारत निर्माण हुआ है ,सांसद और नेताओं के निजी जीवन में ,भारस्ताचार में ।
बहरहाल गुस्सा सरे देश में है ,और ऐसे में कोई अन्ना हजारे जैसा समाजसेवी सड़क पर मसाल लेके भारस्ताचार के खिलाफ अलख जगाने सड़क तक आता है तो किसी को आश्चर्य करने की जरूरत नहीं है । आज अन्ना की आवड बुलंद है क्यूँ की अपनी संसद नहीं बोलती । समय रहते चीजें पारदर्शी नही हुई तो सरकार के रस्ते में दुस्वारियां और बढेंगी । तो जरूरी है की कम को कागज से उतर कर मूर्त रूप दिया जाये । जिस दिन हर प्रतिनिधि जवाबदेह हो जायेगा चीजें प्रत्यक्ष रूप से साथ पर होंगी उसी दिन से सही मायनों में भारत निर्माण की नीव राखी जाएगी ।

लोकतंत्र का एक ओजार

लोकतंत्र हर शासन तंत्र सबसे पारदशी मणि जाती है । तो ये जाहिर है की इस पारदर्शिता में और जनता के विस्वास को गढ़ने में कई चीजों का उपयोग होता होगा । सूचना का अधिकार उसी पारदर्शिता को उभरने में या कहें उसी विस्वास के नये भूगोल गढ़ने में एक कड़ी सरीखा है ।
सूचना का अधिकार हमेशा चर्चा के केंद्र में रहा है , चाहे वो शैला मसूद के मामले में रहा हो या फिर २ जी के मामले में या फिर प्रणब मुखर्जी की चिठ्ठी उजागर करने में । आज भी कई लोग इश्क इस्तेमाल नहीं करते परन्तु जितने लोग करते हैं वो सराहना के काबिल हैं । हाँ कई बार ऐसा होता है की सही सूचना नै दी जाती । सत्ता पक्ष के लिए कई बार ये गले की हड्डी साबित हुई है ।
मसलन कारपोरेट मामलों के मंत्री वीरपा मोइली और कानून मंत्री सलमान खुशीद के बयानों से ये साफ हो जाता है की ये कोरस में क्या कहना चाहते हैं । दोनों का मन्ना है की आर टी आई के बेजा इस्तेमाल से संस्थाओं के कामकाज पर असर पड़ता है । इन मंत्रिओं के इस बयान से कुछ हो न हो उनके हौसले जरुर बुलंद होंगे जिन्होंने सूचना के अधिकार के ताहत sउचना देने में ताल मटोल की हो । भले ही इन्होने संसोधन की बात न की हो परन्तु उन लोगों के लिए सोने पे सुहागा है जो लगातार इस हथियार को कुंद करने को प्रयास रत हैं । आज जिस तरह से इश्क इस्तेमाल और इसके प्रति जागरूकता फ़ैल रहा है वो सुखद है हर भारतीय के लिए ।
प्रश्न उठता है की क्या इसकी जरूरत थी ? तो आज के समकालीन दौर में जिस तरह से राजनीती लामबंद हुई है , उसी लामबंदी को तोड़ने में इसका इस्तेमाल किया जा रहा है ,नही तो जिस तरह के घोटाले हो रहे हैं उनकी कलाई कभी नै खुलती ।
प्रणब मुखर्जी के चिठ्ठी जब सुब्रमण्यम स्वामी ने निकलवाई तो सलमान खुर्शीद ने स्वामी को आड़े हांथों लिया और कहा की कोई मंत्री प्रधानमंत्री को गोपनीय चिठ्ठी लिखता है तो उसे साझा या सार्वजनिक क्यूँ की जानी चाहिए ?
ये बयान बचकाना इसलिए है की यहाँ सवाल की मंत्री और नेता नही है यहाँ सवाल पुरे देश का है और अगर खिन ऐसी खिचड़ी पकती है तो उससे सार्वजनिक होना ही चाहिए । आप जनता के प्रति निधि है उसके प्रति आपको जवाबदेह होना है ।
पुरवा सूचना आयुक्त वजाहत हबिबुलाह ने मोइली और खुर्शीद की टिप्णियों पर प्रतिकार किया है ,और सलाह देते हुए कहा है की इससे घबराने की जरूरत नही । इसे प्रशासन को मजबूत करने के औजार के रूप में देखना चाहिए न की हथियार के रूप में ।
बहरहाल यहाँ ये देखना दिलचस्प होगा की जो सरकार पारदशी और जवाबदेह प्रशासन का डंका पीट पीट नही थकती आज उसी के कई मंत्रिओं के दम फूल रहे हैं ।