मंगलवार, 24 नवंबर 2015

भारत में राम मंदिर का मुद्दा एक बार फिर से नया भूगोल गढ़ रहा है . तथाकथित सेकुलर लोग लामबंद हो रहे है . एक प्रायोजित कार्यक्रम शुरू हो गया है . सिंघल जी के स्राधांजलि के बहाने भाजपा व संघ के मुह पर से दसको से बंधी जाब अचानक से खुल गयी है . ये मुखर होकर बोल रहे हैं . जिस हिंदुत्वा की खाल ओढ़ कर वोटों का द्रुविकरण किया था आज वह रंगा सियार साबित हो रहे हैं . अगर वोट और बहुमत की ही बात थी तो अब तक राम मंदिर की ईमारत बुलंद हो जानी चाहिए थी . लेकिन जिस तरह से स्राधांजलि के नाम पर भाजपा राम मंदिर को हवा दे रही है ये मात्र एक राजनीति का छिनरझप है  .यकीन मानिये कुछ दिनों बाद धीरे से ये ब्यानबीर ही इस मुद्दे को ठंढे बसते में डाल देंगे और हम - आप अपनी संवेदना के साथ वही ढीठके खड़े रहेंगे . हम सब को अपनी भावनाओ को लगाम से कस कर ठन्डे दिमाग से ये सोचना चाहिए की जिस देश की मिट्टी खुद राम लला के पैदा होने का उत्सव मानती हो . जहाँ मिट्टी राम लला के तन ले लिपटने पर इतराती हो वहां  हिंदुत्वा का बोलबाला होना चाहिए वहा हिंदुत्व अपने खेवनहार का बाट जोहेगी ?  इस देश में इस बहस पे तत्काल पूर्णविराम लगे की राम मंदिर बनेगा या नही मसलन बहस ये हो की राम मंदिर भारत में क्यों नही बनेगा . जिस भारत में मर्यादा पुर्सोतम श्री राम ने जन्म लिया उस देश में भगवत आस्था पर प्रश्न उठाना ही जाहिलियत है . इस देश की राजनीति अगर शतरंज के घोड़े जैसा ढाई घर चलना बंद कर दे उस दिन हिन्दुस्तान को अखंड भारत होने से कोई नही रोक सकता . सत्ता का चरित्र होता है की या तो वो निरंकुश बनती है या बेहंगा . ये बिम्ब निरंकुश होने के नही . 

बुधवार, 4 जनवरी 2012

मैकशी के लिए या मौत के लिए शराब ..????

कहते हैं इन्सान वो होता है जो अपनी गलतिओं से सिख ले । पर सीखना तो दूर कोई चेतता भी नही । पिछले दिनों बंगाल में देशी शराब पिने से कई लोगों को अपनी जान गवानी पड़ी । सिटी ऑफ़ जॉय कहा जाने वाला शहर सिटी ऑफ़ सॉरो बन गया । सरकार ने दिखावे के नाम पर कुछ लोगों का पकड़ धर किया था पर अब सब कुछ शांत हो गया।
अभी एक पक्वाडा ही बिता था की दूसरी घटना आन्ध्र प्रदेश में घटी । दिन भर कम के बाद थोडा शराब पिने से उससे नशा नही मौत मिलेगी इश्क पता उसे भी नही था । पैसे की थोड़ी लालच ने कई लोगों को मौत दे दी । तिन महिलाओं के साथ सोलह लोगों की मौत हो गयी । इनकी मौत दो दिन बाद अस्पताल में ही हुई जहाँ डॉक्टर ने बताया की देशी शराब में मिथाइल अल्कोहल मिलाने से ऐसा हुआ । पर सोचने की जरूरत है की ऐसा क्यूँ हो रहा है ? सरकार चुप चाप मुख्दर्शक क्यूँ बनी है ? सवाल उठता है की क्या सरकार की संवेदना मर चुकी है ? सरकार इसे रोकने को कोई कदम क्यूँ नै उठाती ?
अगर सरकार कुछ करती तो आलम ये नहीं होता । हाँ ऐसा जरुर होता है की दिखावे के लिए कुछ लोगों को पकड़ जरुर लिया जाता है पर उनकी राजनीति पहुच और उनके र्शुख इतने होते हैं की कोई उनका बल भी बका नै कर सकता । यही वजह है की उनपर कोई सिकंजा नही कसा जाता । तो सवाल यह है की कब तक चाँद लोगों के मुनाफे के लिए गरीबों की जान ली जाएगी॥ यूँ आबकारी कानून किसी भी तरह की मालावत वाली शराब का कम करने वालों के खिलाफ भरी जर्मन के साथ साथ सख्त सजा का प्रावधान है । लेकिन देशी शराब का धंदा करनेवाले इन कानूनों को धता बता कर धडल्ले से अपना कारोबार चला रहे हैं ।

सोमवार, 2 जनवरी 2012

मिल का पत्थर या ताबूत की किल

उतर प्रदेश में चुनाव के दिन जैसे जैसे नजदीक आ रहे हैं सियासी गर्मी बढती जा रही है । इसे चुनावी भाषण के शब्दों के चयन से बखुब महसूस किया जा सकता है । सभी दलों के तेवर तल्ख़ होते दिख रहे हैं । उम्मीदवारों को लेकर जोड़ तोड़ की राजनीति अपने परवान पर है । हर पार्टी चुनाव में अपना सर्वस्व झोंक देना चाहती है ।
यही कारण है की अपनी छवि तक को दाव पर लगाया जा रहा है, आज ऐसा ही देखने को मिला है । जहा पिछले दिनों बसपा ने बाबू सिंह कुशवाहा और बदमाश सिंह को दागी करार देते हुए पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया था । वही भाजपा ने गर्मजोशी दिखाते हुए उनका स्वागत किया । वैसे यह पहली बार नहीं जब भाजपा चुनाव जितने के लिए बाहुबलियों का मुंह टाक रही हो । नजीर की तौर पर बिहार चुनाव को देखा जा सकता है ।
अब यहाँ देखना दिचास्प होगा की जिस तरह भ्रष्टाचार पर आजकल भाजपा बोलते नहीं थकती , अन्ना और नही लोकपाल पर कई नेता मुखर होकर सामने भी आ चुके हैं । ऐसे में यह कदम क्या भाजपा के लिए आत्मघाती होगा?
मसलन बसपा ने उन्हें निकाला था । सो उसे बिना कुछ किये कराये हथियार मिल गया है । वही कोंग्रेस ने पहले ही इहार कह दिया है की राज्यसभा में लोकपाल विपक्ष की वजह से पास नहीं हुआ । इस कदम को निशाना बनाकर कोंग्रेस इसे मुद्दा बनाने से नहीं चुकेगी । ऐसे में वक्त बतायेगा की भाजपा को चुनावी मैदान तक जाने के लिए और कितनी दुस्वारियों का सामना करना होगा। यह कदम भाजपा के लिए मिल का पत्थर साबित होगा या ताबूत की कील ?
बहार हाल पुरे उत्तर प्रदेश में सियासत के सारे बिसात बिछा दिए गए हैं । अब सह और मात का खेल भी देखना दिलचस्प होगा । यहाँ मायावती फिर से सत्ता पाना चाहती है जिसके लिए उन्होंने हर तैयारी कर रखी है। अगर कोंग्रेस की बात करे तो वह अपनी फिर से खोयी ज़मीन पाना चाहती है । युवराज युपी में जम कर पसीना बहा रहे हैं । यूपी में उनके साख दाव पर लगी है । बिहार में फिसड्डी साबित होने के बाद यु पी में सफलता का परचम लहराना चाहते हैं ।
भाजपा की बात करें तो उसने केंद्र में लोकपाल का समर्थन करके अपना जनाधार वापस पाने की मुहीम पहले ही छेड़ चुकी है ,उमा भारती पर विस्वास जाता कर कार्यकर्ताओं में जन भी फुकने की कोशिश की जा चुकी है । भाजपा अन्ना और कांग्रेश के बीच बढ़ी कडवाहट का फायदा उठाना चाहती है । अब किसका कदम क्या रंग दिखायेगा ये तो समय के गर्व में है ।
बहरहाल आंकड़ों की बाजीगरी बताती है की सियासत में कोई भ्रस्त या घोटाले बाज होता ही नही । होता भी है तो एक निश्चित समय के लिए । अच्छा होगा की बाकि सब कुछ लोकतंत्र पर छोड़ दीजिये । भरोसा कीजिये अपने लोकतंत्र पर । भारतीय लोकतंत्र जिंदाबाद।

रविवार, 4 दिसंबर 2011

राजनीति का तिरया चरित्र

भारत आयोगों और योजनाओं का देश है । मसलन एक योजना १९७३- ७४ में भी बनी । हर पाच साल के बाद बताया जाता है की देश में गरीबी घाट रही है । पिछले साल बतया गया की भारत में गरीबों की संख्या घाट रही है यह छप्पन प्रतिसत से घट कर छबीस प्रतिशत रह गये है । योजना आयोग की यह दलील सुप्रीम कोर्ट को नागवार गुजरी उसने हस्तछेप करते हुए तलब किया । तब कहीं जाकर उसके सुर बदले और आंकड़ा फिर इकतालीस से छप्पन के बिच झूलने लगा ।
दूसरा आंकड़ों की जादूगरी देखिये हर साल सरकार कहती है हम किसानों का कड़ोरों का बैंक ऋण माफ़ कर रहे हैं । यह महज फ़साना ही है इसका पता तब चलता है जब १९९८ से अब तक का रिकॉर्ड देखें । इस सोलह साल में ढाई लाख किसानो ने आत्महत्या की । यहाँ ये सवाल मौजूं है की ये कड़ोरों रूपये जाते कहां हैं । जब इसके जड़ों को खोदें तब पता चलता है की इस पैसे की बन्दर बाँट सियासी रसूख दर करते हैं या सत्ता के चाटुकार । यह सभी को पता है की किसान को कभी बैंकों से लोने मिलता ही नही । यह मुनादी बस अपने पोलिटिक्स मयलेज़ के लिए होता है ।
आज दंभ भरा जाता है की हम विश्व के दुसरे सबसे तेजी से उभरते हुये अर्थव्यवथा वाले देश हैं। एक भारतीय होने के नाते सब को गरवान्वित होना चाहिए । परन्तु कहीं पढ़ा की जी ड़ी पी रेट गिर कर तक़रीबन साडे छह होगया है । ये जो दावे हैं मुझे समझ नही आते क्यूँ की मुझे पता ही नही चलता की जो कुछ हो रहा है जिस तरह के दावे किये जा रहे हैं वह आंकड़ों की बाजीगरी है या फिर राजनीति का तिरया चरित्र । जो लोगों को अमूमन समझ ही नही आता । इसके बावजूद नारा दिया जाता है'' हो रहा भारत निर्माण ''। आम जनता पूछना चाहती है की भारत निर्माण कहां हो रहा है आज भी गरीबी का आंकड़ा कम नही हुआ , हांथों को काम नहीं है। हाँ भारत निर्माण तो हुआ है स्विस बैंक में ,भारत निर्माण हुआ है ,सांसद और नेताओं के निजी जीवन में ,भारस्ताचार में ।
बहरहाल गुस्सा सरे देश में है ,और ऐसे में कोई अन्ना हजारे जैसा समाजसेवी सड़क पर मसाल लेके भारस्ताचार के खिलाफ अलख जगाने सड़क तक आता है तो किसी को आश्चर्य करने की जरूरत नहीं है । आज अन्ना की आवड बुलंद है क्यूँ की अपनी संसद नहीं बोलती । समय रहते चीजें पारदर्शी नही हुई तो सरकार के रस्ते में दुस्वारियां और बढेंगी । तो जरूरी है की कम को कागज से उतर कर मूर्त रूप दिया जाये । जिस दिन हर प्रतिनिधि जवाबदेह हो जायेगा चीजें प्रत्यक्ष रूप से साथ पर होंगी उसी दिन से सही मायनों में भारत निर्माण की नीव राखी जाएगी ।

लोकतंत्र का एक ओजार

लोकतंत्र हर शासन तंत्र सबसे पारदशी मणि जाती है । तो ये जाहिर है की इस पारदर्शिता में और जनता के विस्वास को गढ़ने में कई चीजों का उपयोग होता होगा । सूचना का अधिकार उसी पारदर्शिता को उभरने में या कहें उसी विस्वास के नये भूगोल गढ़ने में एक कड़ी सरीखा है ।
सूचना का अधिकार हमेशा चर्चा के केंद्र में रहा है , चाहे वो शैला मसूद के मामले में रहा हो या फिर २ जी के मामले में या फिर प्रणब मुखर्जी की चिठ्ठी उजागर करने में । आज भी कई लोग इश्क इस्तेमाल नहीं करते परन्तु जितने लोग करते हैं वो सराहना के काबिल हैं । हाँ कई बार ऐसा होता है की सही सूचना नै दी जाती । सत्ता पक्ष के लिए कई बार ये गले की हड्डी साबित हुई है ।
मसलन कारपोरेट मामलों के मंत्री वीरपा मोइली और कानून मंत्री सलमान खुशीद के बयानों से ये साफ हो जाता है की ये कोरस में क्या कहना चाहते हैं । दोनों का मन्ना है की आर टी आई के बेजा इस्तेमाल से संस्थाओं के कामकाज पर असर पड़ता है । इन मंत्रिओं के इस बयान से कुछ हो न हो उनके हौसले जरुर बुलंद होंगे जिन्होंने सूचना के अधिकार के ताहत sउचना देने में ताल मटोल की हो । भले ही इन्होने संसोधन की बात न की हो परन्तु उन लोगों के लिए सोने पे सुहागा है जो लगातार इस हथियार को कुंद करने को प्रयास रत हैं । आज जिस तरह से इश्क इस्तेमाल और इसके प्रति जागरूकता फ़ैल रहा है वो सुखद है हर भारतीय के लिए ।
प्रश्न उठता है की क्या इसकी जरूरत थी ? तो आज के समकालीन दौर में जिस तरह से राजनीती लामबंद हुई है , उसी लामबंदी को तोड़ने में इसका इस्तेमाल किया जा रहा है ,नही तो जिस तरह के घोटाले हो रहे हैं उनकी कलाई कभी नै खुलती ।
प्रणब मुखर्जी के चिठ्ठी जब सुब्रमण्यम स्वामी ने निकलवाई तो सलमान खुर्शीद ने स्वामी को आड़े हांथों लिया और कहा की कोई मंत्री प्रधानमंत्री को गोपनीय चिठ्ठी लिखता है तो उसे साझा या सार्वजनिक क्यूँ की जानी चाहिए ?
ये बयान बचकाना इसलिए है की यहाँ सवाल की मंत्री और नेता नही है यहाँ सवाल पुरे देश का है और अगर खिन ऐसी खिचड़ी पकती है तो उससे सार्वजनिक होना ही चाहिए । आप जनता के प्रति निधि है उसके प्रति आपको जवाबदेह होना है ।
पुरवा सूचना आयुक्त वजाहत हबिबुलाह ने मोइली और खुर्शीद की टिप्णियों पर प्रतिकार किया है ,और सलाह देते हुए कहा है की इससे घबराने की जरूरत नही । इसे प्रशासन को मजबूत करने के औजार के रूप में देखना चाहिए न की हथियार के रूप में ।
बहरहाल यहाँ ये देखना दिलचस्प होगा की जो सरकार पारदशी और जवाबदेह प्रशासन का डंका पीट पीट नही थकती आज उसी के कई मंत्रिओं के दम फूल रहे हैं ।

शुक्रवार, 28 जनवरी 2011

एन. आर. आई. सम्मेलन में यमला पगला दीवाना


एन. आर. आई. सम्मेलन में भारत सरकार ने प्रवासी भारतियों लिए विशेष सुविधाओं का प्रावधान किया है। अपना देश अपनी माटी तथा अपनी संस्कृति के प्रति लगाव होना स्वाभाविक है। इस देश से बाहर जाकर भारत भारतीयता की सुगंध बिखरने वाले महर्षि अरंविद और स्वामी विवेकानंद ने तो कण-कण को अपना आराध्य माना था। निर्माता समीर कर्णिक ने हास्य के माध्यम से ‘यमला पगला दीवाना’ में इन्हीं विषयों को छूने का प’यास किया है।

कहानी में एक मोड़ तब आता है जब गजोधर सिंह का पंजाब से वाराणसी में लेखन करने आयी साहिबा से प्रेम हो जाता है। जिसके पांचो भाई इस शादी के खिलाफ हैं। वो तो अपनी बहन की शादी एन. आर. आई. से ही करना चाहते हैं। फिर धीरे-धीरे पूरा परिवार मिल जाता है। संपूर्ण कहानी में हास्य का अथाह सागर दिखाई पड़ता है।

एक जमाना था जब धर्मेंद’, शत्रुघ्न सिंहा और अमिताभ बच्चन की तुती बोलती थी। फिर 80 से 90 के दशक में सन्नी देओल, बॉबी देओल ने भी दर्शकों को पर्दे पर लुभाया। लेकिन अमिताभ बच्चन का जलवा आज भी कायम है। वो तो ”यंग्री ओल्ड मैन” हैं। एक्टिंग के मामले में सन्नी देओल को तुलनात्मक दृष्टि से ठीक कहा जा सकता है।

फिल्म का तकनीकी पक्ष एवं गीत-संगीत पक्ष को औसत दर्जे का कहा जा सकता है। यह फिल्म दर्शकों को हंसी-मजाक के साथ-साथ तथा एन. आर. आई. के संबंध में ठीक प्रकार से दिखाने में कामयाब हुई है।

रविवार, 23 जनवरी 2011

असीमानंद से स्वामी असीमानंद


विगत दिनों जब राजस्थान एसटीएफ़ और सीबीआई ने मालेगांव बलोस्ट, अजमेर बलोस्ट, मक्का मसजिद और समझौता एक्सप्रेस के कथित आरोपियों के खिलाफ वांछित सबूतों को अपने-अपने ट्रैक पर तेजी से तलाशना शुरू किया और तत्पश्चात संघ से जुड़े कुछ कार्यकर्ताओं के नाम; वातावरण में प्रतिध्वनित होने लगे; तो संघ परिवार-भाजपा, वीएचपी, तथा शिवसेना ने इसे हिंदुत्व के खिलाफ साजिश करार दिया था. उनके पक्ष का मीडिया और संत समाजों की कतारों से भी ऐसी ही आक्रामक प्रतिक्रिया निरंतर आती रही हैं; जब इस साम्प्रदायिक हिंसात्मक नर संहार के एक अहम सूत्रधार (असीमानंद) ने अपनी स्वीकारोक्ति न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष दी तो एक बारगी मेरे मन में भी यह प्रश्न उठा कि यह स्वीकारोक्ति बेजा दवाव में ही सम्पन्न हुई है ….

उधर देश और दुनिया की वाम जनतांत्रिक कतारों ने समवेत स्वर में जो-जो आरोप, जिन-जिन पर लगाए थे वे सभी आज सच सावित हो रहे हैं. आज देश के तमाम सहिष्णु हिन्दू जनों का सर झुका हुआ है; मात्र उन वेशर्मों को छोड़कर जो प्रतिहिंसात्म्कता की दावाग्नि में अपने विवेक और शील को स्वःहा कर चुके हैं. उन्हें तो ये एहसास भी नहीं कि-दोनों दीन से गए …..जिन मुस्लिम कट्टरपंथियों को सारा संसार और समस्त प्रगतिशील अमन पसंद मुसलिम जगत नापसंद कर्ता था; वे अब सहानुभूति के पात्र हो रहे हैं, और जिन सहिष्णु हिन्दुओं ने ”अहिंसा परमोधर्मः ”या मानस की जात सब एकु पह्चान्वो ….या सर्वे भवन्तु सुखिनः कहा वे बमुश्किल आधा दर्जन दिग्भ्रमित कट्टर हिंदुत्व वादियों कि नालायकी से सारे सभ्य संसार के सामने शर्मिंदा हैं.