कहते हैं इन्सान वो होता है जो अपनी गलतिओं से सिख ले । पर सीखना तो दूर कोई चेतता भी नही । पिछले दिनों बंगाल में देशी शराब पिने से कई लोगों को अपनी जान गवानी पड़ी । सिटी ऑफ़ जॉय कहा जाने वाला शहर सिटी ऑफ़ सॉरो बन गया । सरकार ने दिखावे के नाम पर कुछ लोगों का पकड़ धर किया था पर अब सब कुछ शांत हो गया।
अभी एक पक्वाडा ही बिता था की दूसरी घटना आन्ध्र प्रदेश में घटी । दिन भर कम के बाद थोडा शराब पिने से उससे नशा नही मौत मिलेगी इश्क पता उसे भी नही था । पैसे की थोड़ी लालच ने कई लोगों को मौत दे दी । तिन महिलाओं के साथ सोलह लोगों की मौत हो गयी । इनकी मौत दो दिन बाद अस्पताल में ही हुई जहाँ डॉक्टर ने बताया की देशी शराब में मिथाइल अल्कोहल मिलाने से ऐसा हुआ । पर सोचने की जरूरत है की ऐसा क्यूँ हो रहा है ? सरकार चुप चाप मुख्दर्शक क्यूँ बनी है ? सवाल उठता है की क्या सरकार की संवेदना मर चुकी है ? सरकार इसे रोकने को कोई कदम क्यूँ नै उठाती ?
अगर सरकार कुछ करती तो आलम ये नहीं होता । हाँ ऐसा जरुर होता है की दिखावे के लिए कुछ लोगों को पकड़ जरुर लिया जाता है पर उनकी राजनीति पहुच और उनके र्शुख इतने होते हैं की कोई उनका बल भी बका नै कर सकता । यही वजह है की उनपर कोई सिकंजा नही कसा जाता । तो सवाल यह है की कब तक चाँद लोगों के मुनाफे के लिए गरीबों की जान ली जाएगी॥ यूँ आबकारी कानून किसी भी तरह की मालावत वाली शराब का कम करने वालों के खिलाफ भरी जर्मन के साथ साथ सख्त सजा का प्रावधान है । लेकिन देशी शराब का धंदा करनेवाले इन कानूनों को धता बता कर धडल्ले से अपना कारोबार चला रहे हैं ।
बुधवार, 4 जनवरी 2012
सोमवार, 2 जनवरी 2012
मिल का पत्थर या ताबूत की किल
उतर प्रदेश में चुनाव के दिन जैसे जैसे नजदीक आ रहे हैं सियासी गर्मी बढती जा रही है । इसे चुनावी भाषण के शब्दों के चयन से बखुब महसूस किया जा सकता है । सभी दलों के तेवर तल्ख़ होते दिख रहे हैं । उम्मीदवारों को लेकर जोड़ तोड़ की राजनीति अपने परवान पर है । हर पार्टी चुनाव में अपना सर्वस्व झोंक देना चाहती है ।
यही कारण है की अपनी छवि तक को दाव पर लगाया जा रहा है, आज ऐसा ही देखने को मिला है । जहा पिछले दिनों बसपा ने बाबू सिंह कुशवाहा और बदमाश सिंह को दागी करार देते हुए पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया था । वही भाजपा ने गर्मजोशी दिखाते हुए उनका स्वागत किया । वैसे यह पहली बार नहीं जब भाजपा चुनाव जितने के लिए बाहुबलियों का मुंह टाक रही हो । नजीर की तौर पर बिहार चुनाव को देखा जा सकता है ।
अब यहाँ देखना दिचास्प होगा की जिस तरह भ्रष्टाचार पर आजकल भाजपा बोलते नहीं थकती , अन्ना और नही लोकपाल पर कई नेता मुखर होकर सामने भी आ चुके हैं । ऐसे में यह कदम क्या भाजपा के लिए आत्मघाती होगा?
मसलन बसपा ने उन्हें निकाला था । सो उसे बिना कुछ किये कराये हथियार मिल गया है । वही कोंग्रेस ने पहले ही इहार कह दिया है की राज्यसभा में लोकपाल विपक्ष की वजह से पास नहीं हुआ । इस कदम को निशाना बनाकर कोंग्रेस इसे मुद्दा बनाने से नहीं चुकेगी । ऐसे में वक्त बतायेगा की भाजपा को चुनावी मैदान तक जाने के लिए और कितनी दुस्वारियों का सामना करना होगा। यह कदम भाजपा के लिए मिल का पत्थर साबित होगा या ताबूत की कील ?
बहार हाल पुरे उत्तर प्रदेश में सियासत के सारे बिसात बिछा दिए गए हैं । अब सह और मात का खेल भी देखना दिलचस्प होगा । यहाँ मायावती फिर से सत्ता पाना चाहती है जिसके लिए उन्होंने हर तैयारी कर रखी है। अगर कोंग्रेस की बात करे तो वह अपनी फिर से खोयी ज़मीन पाना चाहती है । युवराज युपी में जम कर पसीना बहा रहे हैं । यूपी में उनके साख दाव पर लगी है । बिहार में फिसड्डी साबित होने के बाद यु पी में सफलता का परचम लहराना चाहते हैं ।
भाजपा की बात करें तो उसने केंद्र में लोकपाल का समर्थन करके अपना जनाधार वापस पाने की मुहीम पहले ही छेड़ चुकी है ,उमा भारती पर विस्वास जाता कर कार्यकर्ताओं में जन भी फुकने की कोशिश की जा चुकी है । भाजपा अन्ना और कांग्रेश के बीच बढ़ी कडवाहट का फायदा उठाना चाहती है । अब किसका कदम क्या रंग दिखायेगा ये तो समय के गर्व में है ।
बहरहाल आंकड़ों की बाजीगरी बताती है की सियासत में कोई भ्रस्त या घोटाले बाज होता ही नही । होता भी है तो एक निश्चित समय के लिए । अच्छा होगा की बाकि सब कुछ लोकतंत्र पर छोड़ दीजिये । भरोसा कीजिये अपने लोकतंत्र पर । भारतीय लोकतंत्र जिंदाबाद।
यही कारण है की अपनी छवि तक को दाव पर लगाया जा रहा है, आज ऐसा ही देखने को मिला है । जहा पिछले दिनों बसपा ने बाबू सिंह कुशवाहा और बदमाश सिंह को दागी करार देते हुए पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया था । वही भाजपा ने गर्मजोशी दिखाते हुए उनका स्वागत किया । वैसे यह पहली बार नहीं जब भाजपा चुनाव जितने के लिए बाहुबलियों का मुंह टाक रही हो । नजीर की तौर पर बिहार चुनाव को देखा जा सकता है ।
अब यहाँ देखना दिचास्प होगा की जिस तरह भ्रष्टाचार पर आजकल भाजपा बोलते नहीं थकती , अन्ना और नही लोकपाल पर कई नेता मुखर होकर सामने भी आ चुके हैं । ऐसे में यह कदम क्या भाजपा के लिए आत्मघाती होगा?
मसलन बसपा ने उन्हें निकाला था । सो उसे बिना कुछ किये कराये हथियार मिल गया है । वही कोंग्रेस ने पहले ही इहार कह दिया है की राज्यसभा में लोकपाल विपक्ष की वजह से पास नहीं हुआ । इस कदम को निशाना बनाकर कोंग्रेस इसे मुद्दा बनाने से नहीं चुकेगी । ऐसे में वक्त बतायेगा की भाजपा को चुनावी मैदान तक जाने के लिए और कितनी दुस्वारियों का सामना करना होगा। यह कदम भाजपा के लिए मिल का पत्थर साबित होगा या ताबूत की कील ?
बहार हाल पुरे उत्तर प्रदेश में सियासत के सारे बिसात बिछा दिए गए हैं । अब सह और मात का खेल भी देखना दिलचस्प होगा । यहाँ मायावती फिर से सत्ता पाना चाहती है जिसके लिए उन्होंने हर तैयारी कर रखी है। अगर कोंग्रेस की बात करे तो वह अपनी फिर से खोयी ज़मीन पाना चाहती है । युवराज युपी में जम कर पसीना बहा रहे हैं । यूपी में उनके साख दाव पर लगी है । बिहार में फिसड्डी साबित होने के बाद यु पी में सफलता का परचम लहराना चाहते हैं ।
भाजपा की बात करें तो उसने केंद्र में लोकपाल का समर्थन करके अपना जनाधार वापस पाने की मुहीम पहले ही छेड़ चुकी है ,उमा भारती पर विस्वास जाता कर कार्यकर्ताओं में जन भी फुकने की कोशिश की जा चुकी है । भाजपा अन्ना और कांग्रेश के बीच बढ़ी कडवाहट का फायदा उठाना चाहती है । अब किसका कदम क्या रंग दिखायेगा ये तो समय के गर्व में है ।
बहरहाल आंकड़ों की बाजीगरी बताती है की सियासत में कोई भ्रस्त या घोटाले बाज होता ही नही । होता भी है तो एक निश्चित समय के लिए । अच्छा होगा की बाकि सब कुछ लोकतंत्र पर छोड़ दीजिये । भरोसा कीजिये अपने लोकतंत्र पर । भारतीय लोकतंत्र जिंदाबाद।
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