बुधवार, 22 दिसंबर 2010

वो मंजिल पर पहुचे तो मंजिल बड़ा दी

हम भारतीय होने के नाते भारतीय संस्कृति को जीते हैं ,बल्कि संस्कृति हमारे रगों में लहू की तरह दौड़ता है । गीता जो हमारे संस्कृति का एक अनमोल रत्ना है हमारा धर्म ग्रन्थ है जिसमे श्री कृष्ण ने कहा है की'' कर्म करो फल की चिंता मत करो ''। आज इसकी जीती जगती प्रतिमुर्ती हमारे समाज में मोजूद है जो विश्व स्तर पर एक रिकॉर्ड बना कर कहता है की मेरे लिए ये महज एक अंक है । यह शालीनता , सौम्यता ही उसे महानतम क्रिकेटर के रूप में पदस्त करती है । जी मैं बात कर रहा हुईं सचिन रमेश तेंदुलकर की ।
इन्होने जिस तरह से हर पडाव को पर किया है वो सराहनीय है और जिस तरह से कीर्तीमान गद रहे हिन् वो अद्भुत है । जब गावस्कर के शतक को चुना भी नामुमकिन समझा जाता था तब ये सितारा क्रिकेट की दुनिया मैं धूमकेतु की तरह आया और और इस खेल की पराकास्ठा पर पहुच गया ।
आज पूरी दुनिया मैं सचिन के शान मैं कसीदे पढ़े जा रहे हैं वहीँ हमें भी भारतीय बताते हुई दुनिया के शीशे मैं नुमैस करना अच लग रहा है । क्रिकेट के नवोदित खिलाडियों के लिए यह मुकाम पाना सपने जैसा होगा । सचिन के पीछे दो खिलाडी हैं जो इस लक्ष्य का पिचा कर रहे हैं पहले पोंटिंग दुसरे कैलिस । बहरहाल कुछ बैटन की सचाई समय की कसौटी पर तय होते हैं ।
आज ब्राडमैन के देश तक सचिन की गूंज सुनाई दे रही है । सचिन को क्रिकेट के कद्दावर खिलाडी ब्राडमैन से बेहतर मानते हैं ।
आज इस बात की चर्चा जो पकड़ने लगी है की भारत के इस सपूत को भारत रत्ना मिलना चाहिए । देश की रस्त्रुया पार्टियाँ भी इस बात से इतफाक रखते हैं । खैर आज सारा भारत खुस है । सचिन ने क्रिसमस के मौके पर शांता बन कर शतक की अर्धशतकीय पारी उपहार मैं दी है । आज सारा भारत सचिनमय हो गया है ।'' आने वाली पीढियां रस्क करेंगी कि हमने सचिन को खेलते देखा है ''

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें