गुरुवार, 23 दिसंबर 2010

आओ भारस्ताचार भारस्ताचार खेलें

आजादी के शिलान्यास के बाद गाँधी जी ने नेहरु से कहा था कि अब समय आगया है जब कांग्रेस को ख़त्म कर देना चाहिए । हमने अपना लक्ष्य प् ही लिया है । इस बात पर नेहरु तैयार नई हुए । सवाल यह उठता है कि क्या उन्हें सत्ता के नशा का अंदाजा था ।
बहरहाल हालत जो भी हो परन्तु एक बात तो तय है कि नेहरु के बागडोर सँभालते वो तमाम चीजें पार्टी में घर करने लगी । मसलन वो आज नासूर बन कर उभर रही हैं , चाहे वो कश्मीर हो या चीन
गौरतलब है कि जिन विचारधाराओं के साथ कांग्रेस का गठन हुआ था आज उसे हासिये पर धकेल दिया गया है आज कई घोटालों में उसकी संलिप्तता देखि जा सकती है । नेताओं कि मंशिकता इसी बात से समझी जा सकती है कि पार्टी के एक नेता घोटाले में फसते हैं और जब उनसे इस्तीफा माँगा जाता है तो वो कहते हैं कि जन दे दूंगा पर इस्तीफा नही दूंगा । तो यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि ये राजनीती में घोटालों के लिए ही आते हैं वो भी आणता सतु बांध के ।
इन्ही सब के बिच दिल्ली में कांग्रेस का १२५ वें वर्ष गांठ मना । यह महाधिवेसन किस मुद्दे पर था ये साफ नही हो सका। क्या जिस तरह से बिहार के जनता पर युवराज का कोई जड़ो नही चला उस पर या या जिस तरह कांग्रेस बिहार में रसातल में चली गये उसपर । यह अपने हर कि समीक्षा थी या आगामी चुनाव कि मद्देनजर कार्यकर्ताओं में जान फिकने कि कवायद । स्समझ से प्रे है बेहतर होगा आप खुद इसे जिस परिपेक्ष में चाहे ढल लें ।
पर एक बात तो तय है कि कांग्रेस को आत्मचिंतन कि जरूरत है । आज इस २१ शताब्दी में भी जाट पट और संप्रदाय कि राजनीती करती है । अच होता बिहार चुनाव के नतीजे और तात्कालिक अयोध्या मामले पर नजर डोडा लेटी अगर इससे कोई सबक ली होती तो सायद इस ओंची राजनीती से बज आ जाते ।
ये भुत ही दुःख कि बात है कि कि १२५ वर्ष गांठ पर उपलब्धियां नही गिनाये जा रहे , अस्पस्तीकरण दिया जा रहा है । फिलवक्त को देख के लगता है कि कांग्रेस को भाजपा फोबिया हो गया है । आज जिसे कांग्रेस प्रधान मंत्री के रूप में लोगों के सामने पेश कर रही है वो वक्त्य्गत रूप से भी जाती और संप्रदाय कि राजनीती में विस्वास रखता है । उन्हें मन कि राजनीती में आए ज्यदीन नही हुए ये देश के कद्दावर नेता भी मन चुके हैं तो क्यूँ न पार्टी ही उन्हें कुछ सिखा पढ़ा दे । ये दोनों के सेहद के लिए अच रहेगा । कम से कम वोट के लिए तो देश को न बातें
रंगीन दुनिया में बदरंग जिन्दगी जीते रहे
हमारे हाँथ में खली प्यालें हैं
जिन्होंने बक्शा नहीं अपने जमीर को
आज ऐसे हमारे वतन के रख्वालें हैं

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