शनिवार, 22 जनवरी 2011

कांग्रेस मतलब परिवारवाद


भारत में हम हिन्दुओं को जहां वेलेंटाइन डे, फ्रेंडशिप डे मनाने से ही फुरसत नहीं है लेकिन देश से दूर कुछ लोग लगातार हमारी संस्कृति और धर्म के संवर्धन में जुटे हुए हैं.इन्ही में से एक है विलायत में हिन्दू लीडर के रूप ख्यात श्री राजन जेद. उन्होंने हाल ही में विश्वभर में हिन्दुओं को परमपरागत विधी से गुरू-पूर्णिमा उत्सव उत्साह से मनाने का आह्वान किया है. जो की एक अच्छी खबर है.इसी तरह महिला दिवस भी हम मनाते है. किसकी याद में मालूम नहीं लेकिन मनाते है. जबकि नारीशक्ति की वन्दना और शुक्रगुजार होने के लिए दुर्गाष्ठमी से बेहतर कोई भी दिन महिला दिवस के लिए उपयुक्त नहीं हो सकता है.ठीक इसी तरह भारत की आने वाली पीढी यानी बच्चो की सुरक्षा, सम्पन्नता को दांव पे लगाने वाले नेहरू का जन्मदिन हम बालदिवस के रूप में मनाते हैं, जबकि असली भारतीय बाल दिवस तो जन्माष्ठमी है! एक तरफ बच्चो के दिवस में चाचा नेहरू अपनी टांग फंसाए बैठे है, वही देशभर में संचालित नेहरू युवाकेंद्र भी उनको समर्पित है. धन्य है नेहरू जो बाल और युवा दोनों की दुनिया में विराजमान है. अगर कोई सेक्स डे या व्याभिचार दिवस होता तो वहा भी उनके नाम ही होता!! खैर, सोचो तो विवेकानंद युवा केंद्र ज्यादा मुनासिब था..

शहीद दिवस शहीद भगत सिंह के नाम पर और आंतकवाद विरोधी दिवस श्यामाप्रसाद मुखर्जी के नाम पर होना चाहिए लेकिन..इस पर भी गांधी-नेहरू वंश का कब्जा है.आनेवाले दिनों में राहुल, प्रियंका, उनके बेटे-बेटियों. रॉबर्ट वढेरा के जन्मदिन भी किसी दिवस के रूप में मनाये जाए तो हैरत की बात नहीं.

यानी ये जो देश है..सिर्फ नेहरू-गांधी के कारण ही है. यही इसका इतिहास और भविष्य है. बाकी किसी ने कुछ नहीं किया. ध्यान रहे यह कोई मामूली बात नहीं बल्कि आगामी पीढी पर एक तरह के मनोवैज्ञानिक जानकारी लादने का प्रयास है. इस सवाल को जा तक किसी भी एन जी ओ ने नहीं उठाया ..किसी तीस्ता ने इस बेशर्मी के लिए कोर्ट का दरवाजा नहीं खटखटाया. किसी मीडिया ने कवर स्टोरी नहीं बनाई .


भारत के लोकतान्त्रिक राजवंश का सरकारी योजनाओं अथवा विभिन्न सार्वजनिक उपक्रमों के माध्यम से जनता का जनार्दन बनने कोशिश से जुडे कुछ तथ्य पेश किये जा रहे हैं | इसे अवश्य पढ़िये और देखिये किस तरह नामकरण के प्रभाव से जनमानस को नई मानसिक गुलामी की बेड़ियों में जकड़ा जा रहा है |

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